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एनआरसी बिल लागू होने से बांग्लादेशी शरणार्थियों में बढ़ी बेचैनी

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बहेड़ी। उत्तराखंड की सीमा पर बसी भुड़िया और सिली कॉलोनी में करीब 11 सौ बांग्लादेशी परिवार निवास कर रहे हैं। इनमें से तकरीबन सौ परिवार ऐसे हैं जिन्हें 1971 में शरणार्थी बनकर आने पर तत्कालीन सरकार ने बसाया था। उन्हें भारत की नागरिकता के साथ ही पट्टे पर जमीन भी दी गई है। इनके अलावा तमाम परिवार बंगलादेश से रातोंरात यहां आकर खामोशी से बस गए हैं। करीब पांच सौ परिवार ऐसे हैं जो 15 सालों से नागरिकता के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक मताधिकार भी हासिल नहीं हो सका है। न ही उनके राशन कार्ड बने हैं। एनआरसी बिल लागू होने से इन परिवारों की बेचैनी बढ़ गई है।
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वर्ष 1971 में पाकिस्तान का विभाजन होने के बाद बांग्लादेश बना तो वहां के करीब सौ शरणार्थी परिवारों यहां भुड़िया और सिली कॉलोनी में तत्कालीन सरकार ने बसाया था। इन परिवारों को खेती के लिए पट्टे पर पांच-पांच एकड़ जमीन और रहने के लिए आवास के साथ ही भारत की नागरिकता प्रदान की गई थी। इनका कुनबा बढ़ा तो सौ परिवार बढ़कर छह सौ हो गए। इनके अलावा छह सौ ऐसे परिवार हैं जो रातोंरात खामोशी से यहां आकर बस गए। इन्होंने मकान बनाने के लिए अपने ही समुदाय के लोगों से जमीनें भी खरीद लीं। इन परिवारों में से कई नागरिकता, मताधिकार और राशन कार्ड के लिए 15 साल से संघर्ष कर रहे हैं। इनकी नुमाइंदगी करने वाले नागिन बाबा, रसोमय, चंद्रकात राय, हरेंद्र नाथ राय, सुरेंद्र हलधर, पुलिनसील, अदिर हलधर का निधन होने के बाद से यह मुहिम ढीली पड़ गई है।
बुधवार को एनआरसी बिल लागू होने की खबर जैसे ही इन बांग्लादेशी परिवारों को मिली, उनकी बेचैनी बढ़ गई। उन्हें डर है कि सरकार अब उन्हें भारत से वापस बांग्लादेश न भेज दे। ये परिवार यहां व्यापार, खेती और मजदूरी कर अपना भरण पोषण कर रहे हैं। इन परिवारों की महिलाओं ने तो एनजीओ से जुड़कर लिहाफ बनाने का काम भी शुरू कर रखा है। एनआरसी बिल पास होने से अब इन्हें अपनों से जुदा होने के साथ ही रोजी-रोटी छिनने का डर भी सता रहा है। हालांकि कॉलोनी में कोई भी बिल पर कुछ भी कहने से कतरा रहा है। प्रदर्शन या विरोध के सवाल पर उनका कहना है कि इस मामले में वे आपस में राय करने के बाद ही कुछ कह सकेंगे।
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भुडिया में 20 परिवार तो चार साल पहले ही बसे
भुडिया कॉलोनी में करीब बीस परिवार ऐसे हैं जो चार साल पहले ही बांग्लादेश से यहां आकर बसे हैं। रोजी-रोटी की जुगत में ये परिवार दूर-दूर तक मजदूरी करने चले जाते हैं। उन्होंने कुछ समय पहले अपने वोट भी बनवा लिए थे लेकिन जांच के बाद उनके वोट काट दिए गए। अब उन्हें भी यहां से वापस बंगलादेश भेजे जाने का डर सता रहा है।

शेरगढ़ के सहोडा में भी है बांग्लादेशी परिवार
शेरगढ़ के सहोड़ा में करीब 40 बांग्लादेशी परिवार वर्षों से रह रहे हैं, लेकिन इनमें से करीब 10 परिवार ही ऐसे हैं, जिन्हें भारत की नागरिकता के साथ पट्टे पर जमीन सरकार से मिली थी। बाकी 30 परिवार नागरिकता के लिए जोड़तोड़ कर रहे हैं, लेकिन बिल लागू होने से उनमें भी अब नागरिकता न मिल पाने का डर है।
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