कोर्ट का भी आदेश है कि घनी आबादी और पार्कों में मोबाइल टावर नहीं लग सकते..विकास प्राधिकरण के मानकों में भी इसे खतरनाक माना गया है, लेकिन आपको जानकर हैरत होगी कि हमारा नगर निगम शहर के पार्कों में मोबाइल टावर लगाने की तैयारी में है। जिन पार्कों में बुजुर्ग मार्निंग वाक करते हैं, बच्चे खेलते हैं उन पार्कों में टावर लगाने का प्रस्ताव निगम कार्यकारिणी में लाया गया। 12 में 11 सदस्य तो इस प्रस्ताव पर चुप रहकर एक तरह से सैंद्धांतिक सहमति दे चुके थे लेकिन एक पार्षद ने इसका विरोध किया। अब इस प्रस्ताव पर बोर्ड में विचार किया जाएगा।
पार्कों में मोबाइल टॉवर लगाने के लिए इंडस टावर्स कंपनी ने नगर निगम से अनुमति मांगी थी। इस पर नगर निगम प्रशासन ने प्रस्ताव बनाकर कार्यकारिणी में पेश कर दिया। कंपनी का दावा है कि इन टावरों के लगने से शहर में मोबाइल कनेक्टिविटी सुधरेगी। उन्होंने इसके लिए निगम के पार्क मांगे हैं जहां 5 गुणा 5 मीटर की जगह में इसे लगाया जाना है। कार्यकारिणी में प्रस्ताव आने से पहले इंडस कंपनी के अधिकारियों ने अपनी प्रस्तुति दी। इस पर कार्यकारिणी सदस्य गौरव सक्सेना ने आपत्ति जताते हुए कहा कि रेडिएशन खतरनाक है यह नहीं लग सकता। कंपनी अपना तर्क देती रही कि माइक्रोवेव अवन में भी रेडिएशन होता है और मोबाइल में भी लेकिन इसे लोग प्रयोग करते हैं। मेयर ने कहा कि भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर से अगर कोई प्रूफ हो तो उसे लाएं तब बात होगी। यह कहकर कंपनी को कार्यकारिणी से बाहर जाने को कह दिया गया। कार्यकारिणी सदस्य आपस में उलझते रहे। अंत में 11 सदस्यों ने चुप्पी साधकर इस पर मौन सहमति दे दी। तब भाजपा पार्षद कपिल कांत ने धारा 129/3 पर बहस छेड़कर प्रस्ताव पास होने से रोका कि यह प्रस्ताव कार्यकारिणी नहीं बोर्ड के तहत आता है। नियम मंगाने में 15 मिनट लगे। नगर आयुक्त आरके श्रीवास्तव ने इसे पढ़कर सुनाया इस प्रस्ताव को बोर्ड में लाने को कहा गया है।
- दाल में कुछ काला है
पिछले साल मोबाइल टावर लगाने का प्रस्ताव पूर्व नगर आयुक्त शीलधर यादव, अपर नगर आयुक्त ईश शक्ति सिंह और पर्यावरण अभियंता उत्तम कुमार वर्मा कार्यकारिणी में लाए थे। कार्यकारिणी सदस्यों ने तब स्थगित कर दिया था। नगर निगम कार्यकाल 17 जुलाई को खत्म हो रहा है। यह प्रस्ताव दूर- दूर तक नहीं था। 4 जुलाई को बोर्ड की बैठक हुई यह देर तक चली। 5 जुलाई को कार्यकारिणी बैठक होनी थी इसका एजेंडा बंट चुका था जिसमें मात्र एक एजेंडा लगा था जो मोती पार्क को ठेका देने से संबंधित था। पार्षदों की राय पर बैठक 5 जुलाई को स्थगित करके छह जुलाई को कर दी गई लेकिन अचानक कार्यकारिणी सदस्याें के पास एक मैसेज पहुंचा कि इसमें एक अनुपूरक प्रस्ताव लगा दिया गया है जो पार्कों में मोबाइल टावर से संबंधित है। छह को भी बैठक स्थगित कर दिया गया। इसके बाद 12 जुलाई को कार्यकारिणी होनी थी लेकिन अचानक 12 में से पार्षद कपिल कांत को छोड़कर 11 सदस्याें ने अपने हस्ताक्षर करके बैठक पत्रावली पढ़ने के लिए स्थगित करवा दी। अब इसे 15 जुलाई को किया गया। प्रस्ताव के विरोध में कपिल कांत ने अपना मोशन लगाया तो उसमें एक भी पार्षद सदस्य ने हस्ताक्षर नहीं किया। अंतत: कपिल कांत को इसे आपत्ति कहकर लगाना पड़ा।
नियम तो यह कहता है
नियम के मुताबिक स्थगित बैठक में न तो 91 (2) का कोई प्रस्ताव आ सकता है और न ही अनुपूरक प्रस्ताव। अनुपूरक प्रस्ताव हमेशा मुख्य बैठक में 24 घंटे पहले वितरित होना चाहिए, स्थगित बैठक में यह नहीं लगाया जा सकता है। यहीं नहीं, 50 हजार से अधिक किराये वसूली से संबंधित मामले को कार्यकारिणी में नहीं रख सकते इसे बोर्ड में रखा जाता है लेकिन निगम प्रशासन ने मनमानी से इसे हर बार कार्यकारिणी में रखा। जबकि इसका किराया 75 हजार प्रतिवर्ष है।
क्या है विकास प्राधिकरण का नियम
प्राधिकरण नियम और सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक पार्कों में तो कोई बदलाव हो ही नहीं सकता। ग्रीन बेल्ट में पेट्रोल पंप और भोजनालय तो बना सकते हैं लेकिन और कोई निर्माण नहीं हो सकता।
मोबाइल टॉवर का प्रस्ताव पहले भी लाया गया था और इस बार भी आया है। निर्णय सदस्याें को ही लेना है। अगर वे इसे पास करेंगे तभी पास होगा।
डॉ. आईएस तोमर, मेयर
प्रस्ताव को अचानक अनुपूरक में लाकर खेल किया गया है। यह संदेह की स्थिति पैदा करता है कि आखिर क्या कारण है कि मेरे विरोध के मोशन पर कोई भी सदस्य साथ नहीं आया और इसे आपत्ति में दर्ज कराना पड़ा। मोबाइल टावर लगाना ठीक नहीं है विरोध जारी रहेगा।
कपिल कांत, कार्यकारिणी सदस्य
पूर्व कार्यकारिणी ने इस प्रस्ताव को स्थगित किया था क्योंकि यह ठीक नहीं है। प्राधिकरण नियम के मुताबिक पार्क में कामर्शियल एक्टिविटी नहीं हो सकती है यह जनता के सेहत से खिलवाड़ है। अगर जनता ने साथ दिया तो इसमें जनहित याचिका दायर करेंगे।
राजेश अग्रवाल, पूर्व कार्यकारिणी सदस्य
एक्सपर्ट की राय
प्रारंभिक रिपोर्टों से यह पता चला है कि मोबाइल टॉवर से निकले रेडिएशन खतरनाक है। साइंटिफिक जनरल में अभी यह सिद्ध नहीं हो पाया है, नहीं तो मोबाइल कंपनियों के लिए आफत हो जाती। इसके रेडिएशन से दिल और दिमाग ही नहीं चिड़चिड़ापन, सिरदर्द, अनिद्रा जैसी चीजें होती है। कैंसर भी हो सकता है। माइक्रोवेव की रेज खतरनाक नहीं होती क्याेंकि ये फैलती नहीं है-डॉ. सुदीप सरन, फिजीशियन
कई रिपोर्टें आई हैं जिसमें रेडिएशन को खतरनाक बताया है। कोर्ट ने भी इसको लगाने के लिए एक रूलिंग बनाई है कि यह कहां लगाए जाए। पार्कोँ में अगर लगा रहे हैं तो वहां लगाए जहां कोई आता जाता न हो, आबादी में लगाना खतरनाक होगा। नेटवर्क तो जरूरी है लेकिन सेहत भी जरूरी है। गांधी उद्यान जैसे पार्क तो बिल्कुल नहीं हो सकते।
डॉ. डीके सक्सेना, पर्यावरण विशेषज्ञ
मोबाइल टावर तो आज की जरूरत है। तेजी बढ़ रही संचार सुविधाआें के लिए यह जरूरी हो जाता है। लेकिन यह आबादी और ऐसे पार्कों में न लगे जहां अधिक लोगाें का आना जाना लगा रहता है।
जेसी पालीवाल, वरिष्ठ समाजसेवी