बरेली। आभा आईडी बनाने में स्वास्थ्य केंद्रों के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। 26 शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (यूपीएचसी) में सीबीगंज सबसे आगे है। पुराना शहर में आईडी बनाने की गति धीमी है।
रिपोर्ट के तहत अगस्त में शहरी क्षेत्र में 12,67,767 लक्ष्य के सापेक्ष 7,35,725 की आभा आईडी बन चुकी है। यह आंकड़ा लक्ष्य का 58.03 फीसदी है। करीब 5.32 लाख लोग अभी आभा आईडी के दायरे से बाहर हैं।
आभा आईडी से लोगों का डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड तैयार होता है। जांच रिपोर्ट, डॉक्टर की पर्ची, इलाज के रिकॉर्ड सुरक्षित रहते हैं। जरूरत के समय व्यक्ति की सहमति से स्वास्थ्य रिकॉर्ड संबंधी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता के साथ साझा किया जा सकता है। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में कतार में लगने के बजाय सीधे क्यूआर कोड स्कैन कर भी पर्चा बनवाने में सुविधा होती है।
सीएमओ डॉ. विश्राम सिंह ने कहा कि जिन केंद्रों पर आभा आईडी बनाने की गति धीमी है, वहां के चिकित्सा अधिकारियों को आशा कार्यकर्ताओं के जरिये मरीजों की आईडी बनाने को कहा जा रहा है। ओपीडी में पहुंच रहे मरीजों की आईडी भी बनाई जा रही है। प्रगति की समीक्षा के साथ जरूरी दिशानिर्देश और निगरानी के निर्देश नोडल को दिए हैं।
सीबीगंज में 100 फीसदी से ज्यादा कवरेज
आंकड़ों में यूपीएचसी सीबीगंज पहले स्थान पर है। 48,884 पंजीकृत सदस्यों के सापेक्ष 49,076 आभा आईडी बनीं हैं। मढ़ीनाथ 99.85 फीसदी और जगतपुर 90.69 फीसदी के साथ दूसरे, तीसरे स्थान पर है। सुभाषनगर में 71.07 फीसदी, बहेड़ी में 52.65 फीसदी, हजियापुर में 50.59 फीसदी, घेर जाफर खां में 62.67 फीसदी, फरीदपुर में 56.96 फीसदी, आंवला में 61.40 फीसदी कवरेज है। सबसे कम पुराना शहर में 62,510 लक्ष्य के सापेक्ष 23,601 आभा आईडी बनी हैं। यह 37.76 फीसदी है। बाकरगंज में 38.37 फीसदी, संतनगर में 41.95 फीसदी, जसौली में 44.04 फीसदी और शेर अली गौटिया में 44.09 फीसदी आभा आईडी बनी है।
आभा आईडी क्यों जरूरी है..
- डॉक्टर की पर्ची, जांच रिपोर्ट, इलाज का डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड है।
- अस्पताल या डॉक्टर बदलने पर रिकॉर्ड को साझा करना आसान होता है।
- बार-बार पुरानी रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं होती।