कभी देश के इस कोने से तो कभी उस कोने से चाइनीज मांझे से गर्दन कटने से मौत होने की खबरें आ ही जाती हैं। हाल ही में दिल्ली में तीन लोगों की मौत हो गई। स्वदेशी मांझे की जगह इस खूनी चाइनीज मांझे के सामने बरेली के दो सौ साल पुराना सूती धागे से बना मांझा अब अंतिम दिन गिन रहा है, 250 करोड़ का कारोबार सौ करोड़ पर सिमटकर रह गया है। इस सबके बावजूद चाइनीज मांझे के नाम से पहचाने जाने वाले प्लास्टिक वाले मांझे पर रोक क्यों नहीं लग पा रही है, इस सवाल का जवाब मिलता है कि इसके पीछे मजबूत कारोबारी हैं। बिक्री भी इसलिए खूब है, क्योंकि यह काफी सस्ता है और जल्दी खराब भी नहीं होता है।
सात साल पहले बनना शुरू हुआ चाइनीज मांझा धीरे-धीरे स्वदेशी मांझे के गढ़ (बरेली) में भी आ गया और यहां भी इस खूनी मांझे से पतंगें उड़ने लगीं। शुरू में ही इससे हादसे हुए तो कारोबारियों ने इसका विरोध शुरू किया। तत्कालीन केंद्र सरकार के मंत्रियों तक बात पहुंचाई गई, प्रदर्शन हुए, मगर कुछ नहीं हुआ। हालात ये हुए कि यहां के मांझे का निर्यात धीरे-धीरे कम होता गया। बरेली का मांझा प्रधानमंत्री तक के चुनावी भाषणों का हिस्सा बना, मगर इसके संरक्षण के लिए कुछ नहीं किया गया। दिल्ली में तो अब बरेली का मांझा जाता ही नहीं है। मेरठ, बनारस में भी बरेली से कारोबार खत्म हो गया है। मांझा कारोबार से जुड़े 10 हजार से अधिक लोगों में से ज्यादातर ने दूसरे धंधे की ओर पलायन कर लिया है। कोई रिक्शा चला रहा है तो कोई सब्जी बेचता है।
पैंतीस साल से मांझा और पतंग का थोक और फुटक र कारोबार कर रहे इनाम अली बताते हैं कि अब बरेली का मांझा औरंगाबाद, नागपुर, नासिक, अहमदाबाद, सूरत, जयपुर ही जा रहा है। शहर के बाकरगंज, नवदिया, स्वालेनगर, अशरफ खां छावनी समेत कई इलाकों में बनने वाले इस मांझे के पहले एक सीजन में दो- दो सौ कार्टून यहां से सप्लाई होते थे। लेकिन अब मात्र 5 से 10 होते हैं। इनाम बताते हैं कि पहले के मुकाबले सिर्फ 20 फीसदी माल ही बरेली में तैयार हो रहा है। बरेली में इसे बनाने वाले मुट्ठी भर लोग मजबूत कारोबारियों से नहीं लड़ पा रहे हैं।
यह है दोनों मांझों में अंतर
45 साल से मांझा बनाने के कारोबार से जुड़े इदरीस मंसूरी बताते हैं कि बरेली का मांझा बनाने में चावल, सरेस, रंग और सूती धागे का इस्तेमाल होता है और उसे धारदार बनाने के लिए कांच का बुरादा लगाया जाता है। बुरादा लगाने में कारीगरों के हाथों में जख्म भी हो जाते हैं। वहीं चाइनीज मांझा प्लास्टिक के धागे से तैयार किया जाता है, जिस पर लोहे का बुरादा लगा होता है। चाइनीज मांझा गलता भी नहीं है, जिससे सड़कों और बिल्डिंगों पर गिरे रहने या लटके रहने के कारण जब ये लोगों की गर्दन में फंसता है तो टूटता भी नहीं है। ऐसे में लोग जान तक गवां बैठते हैं। जबकि बरेलवी मांझा सूती धागे का होने के कारण पानी में गिरकर गल जाता है। एक चरखी भर बरेलवी मांझा 120 से 360 रुपये में बिकता है, वहीं चाइनीज मांझा 80 से 160 रुपये में मिल जाता है।
यहां है बरेली के मांझे की सप्लाई
लखनऊ, फ र्रु खाबाद, मेरठ, बनारस, कानपुर, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, मलेशिया, सउदी अरब, नेपाल में भी सप्लाई होती है।
यहां से आता है प्लास्टिक मांझा
बंगलुरु, नोएडा, दिल्ली, सोनीपत, पानीपत, लुधियाना
मजबूत लोग कर रहे हैं चाइनीज मांझे का धंधा
कारोबारी निजाम अली बताते हैं कि चाइनीज मांझे का कारोबार मजबूत लोग कर रहे हैं इसलिए उन पर कार्रवाई नहीं हो रही। देश में मुट्ठी भर ही डीलर हैं। शासन और प्रशासन को पूरी सूची सौंपी गई है, माल पकड़वाया गया है लेकिन सब छूट गए। जंक्शन पर लाखाें का माल पकड़ा गया लेकिन कुछ नहीं हुआ।
इस तरह से पड़ा चाइनीज मांझा नाम
ईनाम अली ने बताया कि मुंबई के हाजी शाहवान ने चाइना से लाकर इसे मुंबई में बेचा था। इसके बाद मुंबई में ही बनना शुरू हुआ, फिर सप्लाई शुरू हुई। जिस समय यह आया उस समय स्थिति और बुरी थी। कई हादसे होने के बाद बरेली में बिक्री बंद होने पर लोग मुरादाबाद, रामपुर से प्लास्टिक मांझा लाकर बेचने लगे। मात्र सात साल में कारोबार चौपट कर दिया।
ऑनलाइन भी बिक रहा चाइनीज मांझा
ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट पर बरेली का मांझा बिक रहा है तो चाइनीज मांझा भी बिक रहा है। इनाम अली बताते हैं कि 1700 रुपये में प्लास्टिक मांझा आपको किसी भी शॉपिंग वेबसाइट से मिल जाएगा।