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दिल में लग रही मिर्च.. फसल बिक ही नहीं रही

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हरी मिर्च। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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लॉकडाउन में मिर्च की खेती भी बनी घाटे का सौदा, मंडी तक फसल पहुंचना मुश्किल

बरेली। खेतों में मिर्च की फसल तैयार है मगर लॉकडाउन की वजह से खरीदार नहीं मिल पा रहे हैं। अच्छा पैसा मिलने का सपना देखकर मिर्च की खेती करने वाले तमाम किसान अब अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहे हैं। वाहन पास न होने से फसल को मंडी तक ले जाना भी मुश्किल है। लिहाजा, घर में आर्थिक मजबूती की उम्मीद बनी मिर्च अब किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है।
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जिला कृषि अधिकारी धीरेंद्र चौधरी ने बताया कि करीब दो हफ्ते में हरी मिर्च का उत्पादन करने वाले कई किसानों ने फोन पर संपर्क कर फसल बेचने में आ रही समस्या रखी है। उन्होंने किसानों को इलेक्ट्रॉनिक नेशनल मार्केट से जुड़ने का सुझाव दिया लेकिन यहां भी समस्या आ रही है। अगर किसानों को दूसरे जिलों में फसल ले जाने की अनुमति दिला भी दें तो यह आशंका है कि वहां का बाजार बंद होने पर उन्हें खाली न लौटना पड़े। दूसरा यह सवाल भी है कि बाजार में मिर्च की मांग भी है या नहीं। इन दोनों स्थितियों में किसानों को फसल बेचे बगैर लौटना पड़ेगा और भड़ा अलग उनकी जेबों पर भारी पड़ेगा। जिला कृषि अधिकारी ने बताया कि किसान ऑनलाइन बाजार में भाव देखकर मांग के अनुसार फसल पहुंचा सकते हैं। अगर उनका सौदा तय होता है तो उन्हें आवागमन के लिए पास दिलाने में कृषि विभाग मदद कर सकता है।

1.20 लाख क्विंटल हरी मिर्च का उत्पादन करता है बरेली

भारतीय कृषि विज्ञान केंद्र बरेली के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रंजीत सिंह के मुताबिक बरेली पूरे यूपी में सबसे ज्यादा मिर्च का उत्पादन करता है। नवाबगंज, फतेहगंज पश्चिमी, फरीदपुर, मझगवां, मीरगंज, आलमपुर जाफराबाद, बिथरी चैनपुर के रिठौरा में हरी मिर्च की सर्वाधिक उपज होती है। दूसरे ब्लॉकों की उपज जोड़ी जाए तो हर साल 1.20 लाख क्विंटल मिर्च पैदा होती है जो दिल्ली, एनसीआर, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेेश में सप्लाई की जाती है। उन्होंने कहा कि अबकी बार लॉकडाउन से मिर्च के लिए बाजार नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में किसानों को भारी नुकसान की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। चार बार हुई तेज बारिश ने भी मिर्च को काफी नुकसान पहुंचाया है।

दस रुपये से ज्यादा नहीं मिल रहा मिर्च का भाव

- नवाबगंज के मोहल्ला जामा के किसान मोहम्म नईम 10 सालों से मिर्च की खेती करते चले आ रहे हैं। इस बार उन्होंने दस हजार रुपये प्रति बीघा के हिसाब से मिर्च की फसल पर खर्च किए हैं मगर बाजार न मिल पाने से दस रुपये किलो तक में मिर्च बेच रहे हैं। उन्होंने बताया कि पिछले साल मिर्च 20 रुपये किलो बिकी थी। अगर लॉकडाउन न होता तो दिल्ली समेत कई राज्यों में यहां से मिर्च जाती और अच्छे दाम मिल जाते।
- धनेटा गांव के श्यामलाल पिछले करीब 14 सालों से मिर्च की खेती कर रहे हैं। इस बार भी उन्होंने करीब डेढ़ सौ बिस्वा में हरी मिर्च की फसल बोई है। मिर्च में फलियां शुरू हो गई हैं। ऐसे में वह फसल अब कहां बेचें इसे लेकर संकट है। उनका कहना है कि बरेली की मंडी में सैंकड़ों क्विंटल फसल की बिक्री कर पाना मुश्किल है। ज्यादा दिनों तक संभाल कर रखी भी नहीं जा सकती है। ऐसे में बिकने से तोड़ी गई मिर्च बरबाद हो सकती है।
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- धनेटा के ही मिर्च की खेती करने वाले किसान देवदत्त कोरी भी कई सालों से इससे मुनाफा कमा रहे हैं। इस बार भी उन्होंने करीब 60 बीघा में फसल बोई है। फसल तैयार है, मगर बेचने के लिए मुफीद बाजार नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने बताया कि बरेली समेत दिल्ली, शाहजहांपुर, बदायूं, हरियाणा और पंजाब तक उनकी फसल बिकने जाती रही है। लेकिन इस बार लॉक डाउन होने से अन्य राज्यों के भी बाजार बंद होने से काफी दिक्कत आ रही है।

खिले फूल मगर मुरझाए किसानों के चेहरे

सीबीगंज। लॉकडाउन में गेंदा और गुलाब के फूलों की खेती करने वाले किसानों पर संकट के बादल छाए हुए हैं। उनके परिवार रोजी रोटी का संकट पैदा हो गया है। खेतों में खिले फूल देखकर किसानों के चेहरे खिलने के बजाय मुरझाए हुए हैं।
सीबीगंज के गांव वहजुईया जागीर निवासी राम भरोसे पुत्र हुलासी राम के मुताबिक उन्होंने सात बीघा खेत में पिछले 25 सालों से गेंदा और गुलाब के फूलों की खेती करत रहे हैं। इस बार भी हजारों रुपये खर्च कर गेंदा की पौध लगाई थी जो डेढ़ माह पूर्व तैयार हो गई। अब उस पर फूल भी आ गए लेकिन इसी दौरान गत 22 मार्च से देश में लॉक डाउन लग गया। सभी धार्मिक सार्वजनिक आदि कार्यक्रमों के आयोजन पर रोक लग गई। ऐसे में फूलों की बिक्री बंद हो गई। खेतों में खड़ी फूलों की फसल खराब हो रही है। फूलों को कोई भी खरीदने वाला नहीं है। बताया कि इस सीजन में छह लाख रुपये तक की फूलों की बिक्री हो जाती थी । ऐसे किसानों की सुनने वाला कोई नहीं है। यही हाल फूलों की खेती करने वाले अन्य किसानों का भी है। जिनके सामने रोजी रोटी का संकट आ गया है। संवाद
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