बरेली। झोलाछाप के इलाज से युवक की हालत बिगड़ने के मामले में कार्रवाई न होने से नाराज परिजनों के हंगामा और फजीहत के बाद अब प्रकरण की जांच होगी। स्वास्थ्य विभाग का यह रवैया झोलाछापों पर नियंत्रण के दावों पर सवाल खड़े कर रहा है।
दरअसल, परिजनों के हंगामे के बाद कार्रवाई के नाम खानापूर्ति की पोल खुली तो विभागीय अफसरों की मिलीभगत की चर्चाएं तैरने लगीं। बताते हैं कि पिछले माह पीड़ित के परिजन की शिकायत पर नोडल अफसर डॉ. अमित जांच करने पहुंचे। सीलिंग की कार्रवाई से जाहिर है कि क्लीनिक अवैध रूप से संचालित था। जब क्लीनिक अवैध है और युवक झोलाछाप है तो गलत इलाज की जांच का कोई औचित्य नहीं है। हालांकि, अधिकारियों के मुताबिक युवक ने डी फार्मा की डिग्री ली है। क्लीनिक का पंजीकरण नहीं था। इसलिए तत्काल सीलिंग की कार्रवाई की गई।
सीएमओ डॉ. विश्राम सिंह के मुताबिक युवक टेस्टिकल कैंसर से पीड़ित है। जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन कैंसर का इलाज उपलब्ध न होने से उसे हायर सेंटर ले जाने के लिए कहा है। आरोपों की जांच के लिए टीम गठित की है। जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई की जाएगी।
सवाल : नोडल अफसर ने क्यों नहीं भेजी रिपोर्ट
परिजन शिशुपाल के मुताबिक, झोलाछाप जयवीर की क्लीनिक सील होने से स्पष्ट है कि गलत ऑपरेशन की जानकारी अफसरों को थी, लेकिन नोडल अधिकारी ने संबंधित कार्रवाई की सूचना बारादरी थाने में नहीं दी। जबकि शासनादेश के तहत झोलाछाप की क्लीनिक पर रिपोर्ट के लिए तहरीर थाने में भेजी जाती है। आरोप है कि जिम्मेदार ही झोलाछाप को बचाते रहे। जब थाने में रिपोर्ट हुई और मामला दबाना मुश्किल हुआ तो जांच टीम गठित की। हालांकि, बुधवार को झोलाछाप जयवीर ने दर्ज बयान में ऑपरेशन की बात से इन्कार किया है। ब्यूरो