एक नहीं, ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब किसानों की सुविधा के नाम पर बड़े प्रोजेक्ट लाए गए। सफेदपोशों ने उनका राजनीतिकरण कर एक तरफ किसानों का हमदर्द दिखने की कोशिश की तो दूसरी ओर सरकारी विभागों को लूटखसोट की खुली छूट मिली। मगर किसानों को इन परियोजनाओं को कोई फायदा नहीं मिल पाया। असल में राजनेता और अफसर किसानों के कितने हमदर्द हैं, यह इसी बात से पता लगता है कि सिंचाई विभाग की ढाई से तीन हजार करोड़ की लागत से बनी ऐसी 40 से ज्यादा नहरें गायब हो गईं जिनकी देखरेख रुहेलखंड नहर डिवीजन करता था। इन नहरों को पाटकर कालोनाइजर्स और दबंगों ने कालोनियां खड़ी कर दीं। कार्रवाई के नाम पर अफसर खानापूरी करते रहे। इसके बावजूद अब फिर किसानों के नाम पर बदायूं सिंचाई परियोजना में 2208 करोड़ रुपये खपाने की तैयारी की गई है। छह सालों से यह परियोजना लटकी हुई है। लिहाजा किसानों को अब तक सिंचाई के लिए पानी तो नहीं मिला उल्टे मुआवजा मिलने के झांसे में अपनी जमीन खुर्दबुर्द कराकर तबाह और हो गए।
नहरें जो गायब हो गईं
शहर में पीरबहोड़ा, मुंशीनगर, कुसुमनगर, सुरेश शर्मा नगर, जोगी नवादा, ग्रीन पार्क से हरूनगला और बीसलपुर रोड तक करोड़ों की लागत से बरसों में बनीं नहरें अब नहीं दिखतीं। रामपुर-दिल्ली रोड पर सीबीगंज से आगे नदौसी, ट्यूलिया आदि गांवों से निकली 40 किमी लंबी नहर इनमें प्रमुख है। शाहजहांपुर रोड पर नरियावल से भिंडौलिया होते हुए 32 किमी लंबी नहर भी गायब हो चुकी है। यह नहर 60 साल पहले बनी थी। नवाबगंज, फरीदपुर, भुता, नवाबगंज, क्यूलड़िया, भोजीपुरा और बहेड़ी में भी करीब 40 नहरें गायब हो गईं और उनकी जमीन पर पक्के निर्माण हो गए। सिंचाई मंत्री धर्मपाल सिंह ने नहरों की जमीन को कब्जामुक्त कराने की घोषणा की थी, लेकिन अब तक उनकी कार्रवाई जमीनी रूप लेती दिखाई नहीं दे रही है।
अंधाधुंध सर्किल रेट बढ़ाने से बढ़ी बदायूं परियोजना की लागत
बदायूं सिंचाई परियोजना की लागत रामगंगा किनारे जमीनों के सर्किल रेट अंधाधुंध ढंग से बढ़ने के कारण चार गुनी बढ़ चुकी है। इससे राजस्व का नुकसान तो हो ही रहा है, साथ ही नहरों के बीच में आने वाली जमीन अधिग्रहीत होने से किसान भी तबाही के कगार पर हैं क्योंकि मुख्य नहर समेत रजबहा और माइनर नहरों को खेतों के किनारे या बीच से निकाला गया है। इससे किसान को मुआवजा आधी जमीन का मिला और अधिग्रहण में उनकी जमीन दो गुनी चली गई।
रामगंगा में पांच साल से नहीं आ रहा पर्याप्त पानी
पर्यावरण प्रदूषण और हरियाली की कमी से रुहेलखंड मंडल समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बारिश बीते पांच साल से आधी से भी कम हो रही है। रामगंगा, गंगा की सहायक नदी है। यह नदी बरेली से निकलते ही फर्रुखाबाद और कन्नौज के बीच में गंगा में मिल जाती है। साल के 12 महीनों में मानसूनी बारिश के चार महीने छोड़ दें तो आठ महीने रामगंगा में पानी बहुत कम मात्रा में रहता है, जिससे खरीफ सीजन में फसलों की सिंचाई नहीं हो पाती। ऐसे में रामगंगा बैराज में इतना पानी इकट्ठा होकर बरेली आंवला और दातागंज तक इतने बड़े एरिया में फसलों की सिंचाई पाएगी। यह कह पाना कठिन है। आखिरी बार 2010 में रामगंगा में बाढ़ आई थी। रामगंगा में पानी कालागढ़ डैम से ही आता है। इस डैम में कई साल से पानी खतरे के निशान से काफी नीचे रहता है।
बदायूं सिंचाई परियोजना (एक नजर में)
रामगंगा नदी पर बैराज --- 617 मीटर लंबाई
बैराज से मुख्य नहर --- 15.6 किलोमीटर लंबाई
बैराज से ब्रांच नहरें
बरखेड़ा ब्रांच -- रसूलपुर में आरिल नदी पुल से बदायूं सीमा तक 18 किलोमीटर लंबाई
चंपतपुर ब्रांच -- 34 किलोमीटर लंबाई। इसमें 10 रजबहा और 35 माइनर नहरें निकाली जाएंगी।
मुख्य रजबहा -- देवीपुर रजबहा- नौ किलोमीटर लंबाई, भमौरा रजबहा-12.40 किलोमीटर लंबाई, ताजपुर रजबहा-12.5 किलोमीटर लंबाई, रसूलपुर रजबहा- 15.8 किलोमीटर लंबाई, मलकपुर रजबहा- सात किलोमीटर लंबाई।
प्रोजेक्ट की लागत -- 630 करोड़
प्रोजेक्ट की बढ़ी प्रस्तावित लागत -- 2208.22 करोड़