फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

‘ऐसा कौन सा आपातकाल आ गया जो यह कानून बनाना पड़ा’

विज्ञापन
विज्ञापन
बरेली। नागरिकता संशोधन कानून से मुस्लिम बुद्धिजीवी भी सहमत नहीं है। उनका मानना है कि देश में ऐसा कौन सा आपातकाल आ गया, जो हुकूमत को यह कानून बनाने की जरूरत पड़ी। वे हुकूमत की मंशा पर संदेह जताते हुए कहते हैं कि देश हित के मुद्दों को पहले देखना चाहिए। उनके हल तलाशने चाहिए।
विज्ञापन

नया कानून बनाने की वजह वह नहीं है, जो सरकार बता रही है। जब इंसानी हमदर्दी की बात की जा रही है तो चीन, म्यांमार, श्रीलंका में यहां के लोगों पर जो जुल्म हो रहे हैं तो उनकी बात क्यों नहीं की जा रही। इसका मतलब है कि सरकार की मंशा कुछ है और जुबान पर कुछ और है। इस कानून को अगर एनआरसी के साथ जोड़ कर देखेंगे तो पता चलता है कि सरकार आरएसएस के मुस्लिम विरोधी एजेंडे को पूरा करना चाहती है। जब एनआरसी लागू होगा तो करोड़ों मुसलमान, जो गरीब और अनपढ़ हैं, वे अपनी नागरिकता प्रमाणित करने के कागजात हासिल ही नहीं कर पाएंगे। तब उन्हें घुसपैठिया कह कर कैंपों में ठूंस दिया जाएगा। यह बाहर के लोगों को नागरिकता देने का नहीं बल्कि मुसलमानों से नागरिकता छीनने और धर्म परिवर्तन कराने का कानून है। - डॉ. ताहिर बेग, पूर्व प्रोफेसर इंटरनेशनल इस्लामिक यूनिवर्सिटी मलयेशिया।
हमें लगता है कि यह कानून भेदभाव पूर्ण और सांप्रदायिक मानसिकता का परिणाम है, क्योंकि कानून में मुसलमानों को छोड़कर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले बाकी लोगों को नागरिकता देने की बात कही जा रही है, यह देश की विविधता, एकता और रीति रिवाज के बुनियादी मूल्यों के खिलाफ है। नागरिकता चाहने वालों के बीच धर्म के आधार पर भेदभाव करना न केवल संविधान के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है बल्कि मानवता और मानवीय मूल्यों के भी खिलाफ है। यह वास्तविकता किसी से छुपी नहीं है कि श्रीलंका और बर्मा में अधिकांश मुसलमानों का उत्पीड़न हो रहा है। इस तरह यह कानून देश को पक्षपात और इस्लामोफोबिया के समान कमजोर कर रहा है। - अहमद अजीज, (इंजीनियर) अध्यक्ष पैगामे अमन।
विज्ञापन

देश में बेरोजगारी, आर्थिक संकट, मंदी जैसे मुद्दे हैं, पहले उन्हें देखने की जरूरत है। देश हित के उन बड़े मुद्दों पर काम करने की जरूरत है ताकि आमआदमी सुखी होकर जी सके। देश में अभी कोई ऐेसी आपातकालीन या खतरे जैसी स्थिति नहीं है कि एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून को लागू किया जाए। इससे यह संदेश जा रहा है कि मुसलमानों को प्रताड़ित करने के लिए ही सरकार इस तरह के कदम उठा रही है। यह 2024 की अभी से तैयारी है, क्योंकि भाजपा के पास मुद्दे खत्म हो चुके हैं। वह मुसलमानों को वोट के अधिकार से वंचित कर अपना वोट बैंक बढ़ाना चाहती है। इस बात से एतराज नहीं कि घुसपैठियों को निकाला जाए, मगर सिर्फ मुसलमान ही क्यों। जो लोग यहां के नागरिक हैं, उनसे प्रमाण क्यों लिया जाए। - डॉ. एसयू चिश्ती, चिकित्सक।
नागरिकता संशोधन कानून के बहाने हिंदू-मुस्लिम की बात करना सरकार के प्रति संदेह पैदा करता है। यह देश हित में नहीं है। भविष्य में इसके परिणाम बेहतर दिखाई नहीं देते। अगर यह कानून सिर्फ घुसपैठियों के लिए है तो फिर जितने भी घुसपैठिए हैं, सभी को बाहर किया जाना चाहिए। इसमें सिर्फ एक वर्ग को ही क्यों टारगेट किया जा रहा है। इसे देश का को भी नागरिक, चाहे वह हिंदू ही क्यों न हो, इस कानून को स्वीकार नहीं कर रहा। भारत में रहने वाला अपनी नागरिकता का प्रमाण दे, वह भी सिर्फ एक वर्ग तो इससे स्वत: संदेह पैदा होता है। आज देश, संविधान और यहां की संस्कृति से प्यार करने वाला हर शख्स नए कानून पर सवाल खड़े कर रहा है। सेक्युलर मुल्क में कोई भी कानून जाति और धर्म के आधार पर नहीं बनाया जा सकता। - डॉ. उजमा कमर, शिक्षक।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें