बरेली। लोकप्रियता के मामले में मुक्केबाजी, क्रिकेट से पिछड़ रही है। बॉक्सिंग की राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं को भी वह तवज्जो नहीं मिल पाती, जो दूसरे खेलों को मिलती है। इसे लोकप्रिय बनाने के लिए स्पांसर और प्रतियोगिताओं के सजीव प्रसारण की दरकार है। इससे लोगों की इस खेल में रुचि बढ़ेगी और मुक्केबाजी भी क्रिकेट की तरह लोकप्रिय होगी। राष्ट्रीय बॉक्सिंग प्रतियोगिता के लिए शहर आए ओलंपियन सूबेदार एल देवेंद्रो सिंह ने ये बातें कहीं।
वर्ष 2014 में कॉमनवेल्थ खेलों में रजत पदक व 20 से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का नाम रोशन कर चुके एल देवेंद्रो सिंह ने बताया कि प्रसारण न होने की वजह से ही अन्य खेल में भारत में जगह नहीं बना पा रहे हैं। इसका सीधा प्रभाव ओलंपिक जैसे खेलों पर पड़ता है। युवा को रुचि के अनुसार खेलों का चयन करना चाहिए। विभिन्न खेलों के बारे में जानकारी कर उससे जुड़े खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
एल देवेंद्रो ने बताया कि जब वर्ष 2001 में उन्होंने मणिपुर से मुक्केबाजी की शुरुआत की थी, तब जरूरी उपकरणों व प्रशिक्षण के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। अब खेल विभाग, आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट, भारतीय खेल प्राधिकरण जैसी संस्थाएं राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों को तैयार कर रही हैं। सभी जरूरी संसाधन भी मौजूद हैं। अगर मुक्केबाजी की प्रतियोगिताओं का भी सजीव प्रसारण किया जाए तो इसके प्रति लोगों का रुझान बढ़ेगा।
हर ओलंपिक में पदक जीत रहे मुक्केबाज : जयदेव
सबसे कम उम्र में द्रोणाचार्य पुरस्कार हासिल करने वाले जयदेव सिंह बिष्ट ने बताया कि बॉक्सिंग में संभावनाएं ज्यादा हैं, लेकिन इसमें दृढ़ इच्छाशक्ति जरूरी है। वर्ष 1986 से 1992 तक देश के लिए कई पदक बटोरने के बाद 35 वर्ष की आयु में द्रोणाचार्य पुरस्कार हासिल करने वाले जयदेव ने बताया कि जब उन्होंने बॉक्सिंग की दुनिया में कदम रखा था, तब 12 भार वर्ग में से 11 में आर्मी के ही खिलाड़ी पदक लाया करते थे। उन्हें दूसरों के मुकाबले बेहतर सुविधाएं मिलती थीं। अब भारतीय मुक्केबाज लगभग हर ओलंपिक में पदक जीत रहे हैं। आज के युवा एकल खेलों को तवज्जो दे रहे हैं। इस वजह से बीते कुछ वर्षों में पुरुष व महिला खिलाड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है। स्थिति यह है कि अब सब जूनियर व जूनियर वर्ग की प्रतियोगिताओं में भी 400 से 500 खिलाड़ी पहुंच रहे हैं। संवाद