मेयर की सीट भले ही भाजपा ने जीत ली है, लेकिन दिग्गजों के गढ़ में ही पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि कुछ नेता अपवाद भी रहे। वे अपने बूथों पर भाजपा को सपा से आगे रखने में कामयाब रहे, लेकिन सही मायने में भाजपा की इज्जत मुस्लिम बहुल बूथों पर मिले वोटों ने बचाई। अगर मुस्लिम बहुल बूथों पर भाजपा के वोट न निकलते तो पार्टी को मेयर की सीट हासिल करना मुश्किल होता।
विपरीत हवा में लड़कर हारे
बरेली। सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की साजिश भले ही कितनी हाें लेकिन हमारी गंगा जमुनी तहजीब को कोई नहीं मिटा सकता। नगर निगम चुनाव में भी यह बात सच साबित हुई है। हिंदू बहुल आबादी में मुस्लिम और और मुस्लिम आबादी वाले वार्डों में हिंदू प्रत्याशियों ने कड़ी टक्कर दी। भले ही यह प्रत्याशी कांटे की टक्कर में पराजित हो गए लेकिन उन्होंने दिल जीत लिया। वार्ड 43 आकाशपुरम् पहले बुखारपुरा वार्ड था। यहां छह हजार मुस्लिम और 35 सौ हिंदू वोट हैं। यहां से मोहम्मद यामीन पार्षद बने लेकिन मुस्लिम बहुल इस वार्ड में भाजपा के पूर्व पार्षद रूपेंद्र पटेल ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी। वह 109 वोटों के अंतर से हारे। इसी तरह पीरबहोड़ा में 60 फीसदी मुस्लिम वोटरों में पिछली बार भाजपा के अजय सक्सेना जीते थे। इस बार वह नहीं जीत पाए लेकिन वह सबका दिल जीत ले गए। वार्ड 52 बानखाना में मुस्लिम आबादी ज्यादा है। यहां हर बार भाजपा के प्रत्याशी जीतते रहे। इस बार यहां शमीम अहमद चुने गए। उनको 2091 वोट मिले हैं जबकि भाजपा के विष्णु प्रसाद को 891 वोट ही मिल पाए।