बरेली। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जिले की सभी नौ विधानसभा सीटों पर कब्जा कर विपक्षी दलों का सूपड़ा साफ कर दिया था। इससे पहले 2012 के चुनाव में चार सीटें सपा और दो बसपा के कब्जे में थी। भाजपा के हिस्से में शहर, कैंट और आंवला की सीट थी। 2017 के चुनाव में भाजपा ने अपनी सीटों पर तो कब्जा बरकरार रखा ही, सपा और बसपा के कब्जे वाली सीटों पर भी जीत का परचम पहरा क्लीन दिया।
बरेली शहर सीट 1985 से लगातार भाजपा के कब्जे में है। कैंट सीट की बात करें तो 1977 से 2007 के बीच हुए चुनावों में यहां कांग्रेस, जनता दल, सपा, बसपा के अलावा निर्दलीय प्रत्याशी भी जीते। आंवला सीट पर भी अधिकतर भाजपा का ही कब्जा रहा है। 2017 में इस सीट से पूर्व मंत्री धर्मपाल सिंह चौथी बार चुनाव जीते थे। मीरगंज की सीट को सबकी सीट कहा जा सकता है। यहां कभी किसी एक पार्टी का वर्चस्व कायम नहीं रहा। कुछ ऐसा ही मिजाज भोजीपुरा सीट का भी रहा है। 2017 में भाजपा ने सपा के शहजिल इस्लाम से यह सीट छीन ली।
फरीदपुर सीट पर 1991 में भाजपा से नंदराम ने जीत हासिल की थी। इसके बाद इस सीट पर सपा और बसपा का कब्जा रहा। 2017 के चुनाव में भाजपा के प्रो. श्मामबिहारी ने सपा के सियाराम सागर से छीन ली। बिथरी चैनपुर पर यूं तो ज्यादातर कांग्रेस का कब्जा रहा है, लेकिन 1991 के बाद सपा, भाजपा, बसपा का इस सीट पर कब्जा रहा। 2017 में भाजपा के पप्पू भरतौल ने बसपा के वीरेंद्र सिंह को हराकर भगवा फहराया। बहेड़ी सीट पर हर बार रंग बदलता रहा है। यहां कभी भाजपा तो कभी सपा का कब्जा रहा है। 1991 में भाजपा के हरीश चंद्र गंगवार ने सीट पर पहली बार कमल खिलाया था। 1993 में सपा के मंजूर अहमद, 1996 में भाजपा के हरीश चंद्र जीते। 2002 में फिर सपा जीत गई। 2007 के चुनाव में भाजपा के छत्रपाल सिंह गंगवार जीते। 2012 में सपा के अताउर रहमान ने मात्र 18 मतों से भाजपा के छत्रपाल सिंह को मात दी, लेकिन 2017 में छत्रपाल सिंह ने फिर इस सीट पर कब्जा कर लिया। वर्तमान में वह प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री हैं। नवाबगंज सीट पर हमेशा कुर्मी बिरादरी के प्रत्याशी को ही जीत मिली है। राजनीतिक दल कोई भी रहा हो। 2017 में यहां से भाजपा के टिकट पर जीतने वाले केसर सिंह गंगवार कोरोना काल में दिवंगत हो गए थे।