बरेली। जिले का ऐतिहासिक कलक्ट्रेट भवन अपने गौरवशाली अतीत को संजोए हुए है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौर में अंग्रेजों ने इसका निर्माण कराया था। 9.65 एकड़ में फैले इस भवन में 44 कमरे हैं। सभी कक्ष आपस में जुड़े हुए हैं। एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने के लिए बाहर निकलने की जरूरत नहीं पड़ती। भवन की मजबूत दीवारें और 27 फीट ऊंची छत आज भी इसकी पुरानी निर्माण शैली की मजबूती बयां करती हैं।
कलक्ट्रेट भवन का निर्माण सुर्की और चूने से कराया गया था। इसकी दीवारें वर्षों बाद भी मजबूत हैं। संयुक्त कार्यालय में मोटी लोहे की चादरों से बनीं बड़ी-बड़ी आलमारियां हैं, जिन्हें हिलाना भी आसान नहीं है। भवन के सभी कमरों को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए अंदरूनी दरवाजे बनाए गए हैं।
जे. जान्सन प्रथम व एलसी जैन आजादी के बाद पहले डीएम
जिले के पहले जिलाधिकारी के रूप में जे. जान्सन ने 28 अक्तूबर से छह जून 1947 तक जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद एचएस बार्कर सात जून 1947 से पांच अगस्त 1947 तक जिलाधिकारी रहे। आजाद भारत के पहले भारतीय जिलाधिकारी के रूप में एलसी जैन ने छह अगस्त 1947 से 26 अगस्त 1948 तक कार्यभार संभाला।
सुर्की-चूने की खूबसूरत कारीगरी व मोटी दीवारें आज भी बयां करती हैं भवन की मजबूती
बरेली। शहर का ऐतिहासिक सदर तहसील भवन करीब डेढ़ सदी बाद भी अपनी खूबसूरती और मजबूती के लिए जाना जाता है। 1873 में दो बीघा जमीन पर इसका निर्माण कराया गया था।
सुर्की-चूने से तैयार इस भवन की दीवारें तीन से चार फीट तक मोटी हैं, जबकि छतों की ऊंचाई करीब 27 फीट है। पुराने समय की निर्माण शैली ऐसी थी कि गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में भवन के अंदर तापमान सामान्य बना रहता है। इससे पहले सदर तहसील कुतुबखाना स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के भवन में संचालित होती थी। वर्ष 1873 में नए भवन का निर्माण पूरा होने के बाद तहसील को यहां स्थानांतरित किया गया।
सवा सौ साल की विरासत समेटे है जिला अस्पताल की बिल्डिंग
बरेली। रोजाना एक हजार से ज्यादा मरीजों का इलाज कर रहा महाराणा प्रताप संयुक्त चिकित्सालय करीब सवा सौ साल की ऐतिहासिक विरासत समेटे है। शुरुआत में यहां सिर्फ दस से 12 मरीज ही रोजाना इलाज के लिए पहुंचते थे। यह संख्या अब हर दिन सौ गुना से ज्यादा पहुंच चुकी है।
एडी एसआईसी डॉ. आरसी दीक्षित के मुताबिक अस्पताल में लगे पत्थर पर निर्माण वर्ष 1897 और राय बहादुर का नाम दर्ज है। बताते हैं कि अंग्रेज फौज के सैनिक और उनके बच्चाें समेत आसपास के लोग भी यहां दवाएं लेने आते थे। उस दौरान सीएमएस कार्यालय में ही डिस्पेंसरी थी। जहां अब हार्ट वार्ड, फीवर वार्ड है। 1903-04 में अतर अली वार्ड बना। इसमें मरीज भर्ती होने लगे। 1960 में अधिकृत अस्पताल का दर्जा मिला।
वर्ष 2013-14 में अस्पताल का नाम महाराणा प्रताप संयुक्त चिकित्सालय पड़ा। वर्तमान में अस्पताल में 325 बेड हैं। अस्पताल परिसर में ही दायीं ओर सीएमओ कार्यालय भी संचालित है।