1966 में आई फिल्म 'मेरा साया' के गीत ने उत्तर प्रदेश के बरेली शहर को नायिका के झूमके लिए शोहरत भले ही दिलाई हो लेकिन असल में बरेली का बाजार अपने पतंग और मांझे के लिए मशहूर है। देश में पतंग और मांझे का थोक बाजार और निर्माण केंद्र बरेली ही है। गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र से लेकर मध्यप्रदेश तक के पतंग के शौकीन बरेली का पतंग-मांझा ही पीढ़ियों से इस्तेमाल करते रहे हैं। लेकिन अब इस पतंग और डोर की कारोबारी मजबूती कमजोर पड़ती हुई नजर आ रही है।
'एक देश और एक कर' के नारे के साथ लागू हुए जीएसटी ने मांझे और पतंग की एक मात्र मंडी के कारोबार को भी खत्म कर दिया है। साधारण और सस्ते शौक में गिने जाने वाले पतंग पर सरकार ने पांच प्रतिशत जीएसटी लगा दिया है। बदलते समाज और शौक की विपरीत हवा में पहले ही पतंगबाजी का शौक का संतुलन बिगड़ रहा था, अब जीएसटी ने इसे जमीन की ओर गोता लगा दिया है। बरेली के व्यापारियों का कहना है कि पीएम मोदी से लेकर सीएम योगी तक बरेली की इस पहचान को बुलंदियों तक पहुंचाने के वादे कर चुके हैं लेकिन आज तक सुध लेने बाजार में इनके बीच कोई नहीं पहुंचा।
एक दिन में कमाते हैं 20 लाख रुपए
बरेली में पतंग का व्यवसाय करने वाले दिलशाद ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि पहले पतंग पर किसी प्रकार का टैक्स नहीं लगता था लेकिन अब बनाने से लेकर बेचने तक पर भी टैक्स देना पड़ रहा है। उसने बताया कि आज एक सामान्य पॉलिथीन की पतंग बनाने में केवल 60 पैसे का खर्च आता है। उसे हम बाजार में 80 पैसे से एक रुपए तक बेचते हैं। फुटकर व्यापारी भी इन्हें 2 से अधिकतम 5 रुपए तक बेचते हैं। बरेली के पतंग बाजार में बनाई जाने वाली पतंगे राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश, दिल्ली जैसे बड़े राज्यों में जाती है। दिसंबर से लेकर मकर संक्रांति तक करीब रोज 20 लाख का कारोबार होता है लेकिन आज लगातार बढ़ते कच्चे माल की कीमतों के कारण हमारा उद्योग पूरी तरह से खत्म होने की कगार पर खड़ा है। बची हुई कसर कोरोना लॉकडाउन ने पूरी कर दी।
कागज भी हुआ महंगा अब हम क्या करे
कागज की पतंग का व्यवसाय करने वाले व्यापारी इन दिनों बढ़ते कागज की कीमतों से परेशान हैं। मुंबई से दिल्ली और रामपुर होते हुए यह कागज बरेली पहुंचता है। पतंग निर्माण के लिए जो कागज का पैकेट पहले 640 रुपए का आता था, अब वह 750 से 800 रुपए तक हो गया है। पहले कागज की सौ पतंग को तैयार करने में करीब 320 का खर्च आता है लेकिन कच्चा माल की कीमत बढ़ने के कारण यही खर्चा बढ़ाकर 500 रुपए तक पहुंच गया है। जबकि बाजार में यही पतंगे 600 से 700 रुपए बिकती है।
अमर उजाला से बातचीत में फारुख भाई बताते हैं कि आज बरेली में पतंग और मांझे से व्यवसाय से 20 से ज्यादा लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर से जुड़े हुए हैं। अभी केवल 40 प्रतिशत दुकानों में ही पतंग का काम चल रहा है। बाकी 35 प्रतिशत दुकानें पूरी तरह से बंद हो गई है। बाकी 25 प्रतिशत दुकानदार ऐसे हैं, जो सीजन के दौरान ही व्यापार करना पसंद कर रहे हैं। मोमिन कहते हैं कि हमारा व्यवसाय बेरोजगारी का अड्डा है। यहां वो ही लोग काम करते हैं, जिनके पास किसी काम का अनुभव नहीं है। इस काम के लिए कोई डिग्री, किसी हुनर या कोई अनुभव की जरूरत नहीं होती है। केवल देखते-देखते व्यक्ति एक दिन में काम सीख जाता है। इस काम के लिए उन्हें महज 200 से अधिकतम 400 रुपए प्रतिदिन ही मिलते हैं लेकिन राजनीतिक पार्टियों की पतंगबाजी ने हमारे बेरोजगारी के अड्डे को भी खत्म कर दिया है।
मोदी योगी वादा कर भूल गए हमें
बरेली में पतंग के साथ मांझा भी पूरे देश में प्रसिद्ध है। अखिल भारतीय स्तर पर होने वाली पतंग प्रतियोगिताओं में देश में केवल बरेली का मांझा ही प्रयोग किया जाता है। लेकिन जीएसटी, बढ़ती महंगाई और जनप्रतिनिधियों की परंपरागत कारोबार के प्रति बेरुखी ने इस उद्योग भी पूरी तरह से तबाह कर दिया है।
करीब 20 वर्षों से बरेली में मांझा व्यवसाय से जुड़े सरताज अमर उजाला को बताते है कि आज देश में पतंग और मांझे के कारण बरेली की पहचान है। पतंगबाजी आपसी सौहार्द बनाए रखने का बहुत अच्छा माध्यम है। कई प्रतियोगिताओं में हिंदू, मुस्लिम और सिख एक साथ हिस्सा लेते हैं। एक साथ खाते-पीते हैं और जमकर पतंगबाजी करते हैं। लोगों को आपसी सौहार्द में बांधे रखने वाली पतंगबाजी में भी राजनीतिकरण दिखने लगा हैं।
उन्होंने कहा, पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और सीएम योगी ने हमें वादा किया था कि पतंग और मांझा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए अहम कदम उठाएंगे। बरेली का मांझा देशभर में फेमस होगा लेकिन आज तक स्थिति जस की तस बनी हुई है। मांझा तैयार करने के लिए जो धागा पहले 470 रुपए दर्जन आता था लेकिन अब यहीं धागा 650 से 700 रुपए तक आने लगा है। जीएसटी ने इस उद्योग को भी बहुत प्रभावित किया है। एक अच्छे सूती धागा मांझे की चरखी को तैयार करने में कच्चा माल, लेबर और अन्य सब मिलाकर करीब 2 हजार की लागत आती है। इसके बाद बाजार में दुकानदार अपने रेट के हिसाब से इसे बेचते हैं। इसके अलावा कम लागत के मांझे की कीमत धागे और कच्चे माल पर निर्भर करती है।
धागे की कीमत भी तय करते हैं बड़े लोग
25 वर्षों से इस व्यवसाय से जुड़े हमीन भाई कहते है कि कच्चा धागे के लिए पूरे देश में लुधियाना और चेन्नई में दो ही कंपनियां है। लेकिन अब इन कंपनियों पर भी कुछ चुनिंदा लोगों ने अपना एकाधिकार जमा लिया है। वे कंपनी से सारा माल खरीद लेते हैं। इसके बाद हम जैसे छोटे व्यवसायी को मनमर्जी के दामों पर धागे की सप्लाई करते हैं। ये लोग अपने हिसाब से धागे की कीमतों में इजाफा करते रहते हैं। आज सरकार चीनी मांझे को रोक लगाने के लिए कई तरह की बाते करती है लेकिन यही मांझा अब ऑनलाइन साइट पर उपलब्ध है।
हमीन ने कहा कि सरकार को चाहिए कि बरेली के पतंग और मांझा उद्योग को विकसित करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सेंटर तैयार करे, जहां हम लोग अपना सामान बेच सके। इससे हमें भी अपनी पहचान मिल सके।
पतंगबाजी को मिले खेल का दर्जा
मांझा कारोबारियों का कहना है कि पहले मांझा कारोबार में करीब हजारों परिवार जुड़े थे लेकिन अब इस काम से लोग पल्ला झाड़ रहे हैं। बढ़ती महंगाई और मनोरंजन के अन्य साधन आ जाने के कारण मांझे की बिक्री पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। अगर ऐसा ही माहौल रहा तो उन्हें भी इस काम को बंद करना होगा। अगर ऐसा ही माहौल रहा तो उन्हें भी इस काम को बंद करना होगा। इसके साथ ही उन्होंने सरकार से मांग की है कि पतंगबाजी को खेल का दर्जा दिया जाए. जिससे इस कारोबार में एक नई जान आ सके।
कोई सरकार नहीं सुनती हमारी
व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि बरेली की पतंगे और मांझे महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, हरियाणा, यूपी, एमपी तक जाती हैं। चाहे नेता हो, अभिनेता हो या फिर आम आदमी बड़े शौक के साथ इन्हें उड़ाते हैं लेकिन हमारे जनप्रतिनिधि हमारी किसी भी दिक्कतों पर ध्यान नहीं देते हैं। वोट के लिहाज से हमारा उपयोग करते हैं, उसके बाद फिर भूल जाते हैं। आज इस उद्योग में 100 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से भी लोग काम करते है लेकिन सरकार ने कभी हमारे उद्योग को संवारने के लिए कोई बड़ा काम नहीं किया।