दुनिया को अपने मुक्के का दम दिखाने का हौसला रखने वाली इस लड़की की कहानी मैरीकॉम से मिलती जरूर है। संघर्ष से गुजर कर बरेली की अंजलि पहले बास्केट बॉल खेलती थी। सिर्फ तीन महीने बॉक्सिंग की ट्रेनिंग मिली तो पिछले दिनों फर्रुखाबाद में हुई स्टेट चैंपियनशिप में उसने कांस्य पदक भी जीता। नेशनल चैंपियनशिप के लिए उसका चयन हो गया है। अंजलि के पिता के अशक्त हैं। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बाद भी उसके कदम नहीं डगमगाए। कहती हैं मैरीकॉम से प्रेरणा ली है उनके जैसे बन कर दिखाना है। सुर्खा बानखाना में रहने वाली अंजलि प्रजापति कन्या पाठशाला भूड़ में इंटर की छात्रा है। उसके पिता राकेश प्रजापति टेंपो चलाते थे। छह साल पहले एक हादसे के बाद अपाहिज हो गए। अंजलि घर में सबसे बड़ी है और उससे छोटे तीन भाई और एक बहन है। सभी ने मिलकर परिवार चलाने की कोशिश की। मंडी से सब्जी लाने और उसे बेचने में अंजलि की मां मनसा देवी के साथ पूरा परिवार जुटता है। अंजलि बास्केटबॉल सीख रही थी लेकिन कड़ी मेहनत के बाद भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी। इसके बाद खेल की दुनिया से अपने को अलग करने का मन बना लिया। मां ने दूसरे खेल में हाथ अजमाने को कहा। अंजलि ने मैरीकॉम फिल्म देखी तो नया जोश आया। बॉक्सिंग में किस्मत अजमाने की ठान ली। उसके कोच उसका एक्शन दिखा कर जोश से कहते हैं इसे सपोर्ट मिल जाए तो नाम रौशन कर देगी। वह मई में क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी मुद्रिका पाठक के पास गई और अपना खेल बदलने का प्रस्ताव रखा। कम समय में ज्यादा सीखना मुश्किल था लेकिन उनके आत्मविश्वास को देखकर बॉक्सिंग कोच शेवर अली ने भी सिर्फ तीन महीने की ट्रेनिंग में अंजलि को स्टेट खेलने लायक खिलाड़ी बना दिया। वह सुबह पांच बजे उठकर डोरी लाल अग्रवाल स्पोर्ट्स स्टेडियम जाती है। वहां ढाई घंटे की प्रैक्टिस के बाद यहीं ड्रेस पहनकर सीधे स्कूल चली जाती है। सुबह और शाम प्रैक्टिस में ही उन्होंने अपना मुक्का मजबूत कर लिया। लेफ्ट हुक उसका पसंदीदा शॉट है। वह कहती है कि नौकरी पाना नहीं ओलंपिक के लिए सोना जीतना उसका सपना है।
तकिये में सीखती है बॉक्सिंग
अंजली के पास न तो ग्लब्स खरीदने के पैसे हैं और न ही पंचिंग बैग और पैड। कभी- कभी अपने भाई को तकिया पकड़ाकर वह उसी पर शॉट शुरू कर देती है। स्टेडियम मेें ग्लब्स मिलते हैं, लेकिन ये वहीं जमा हो जाते हैं। अंजलि की मां मनसा देवी और पिता राकेश कहते हैं कि उन्हाेंने कभी खेल से उसे रोका नहीं। वह नाम कमाए यही बहुत है।