सस्ता और टिकाऊ होने की वजह से अलग पहचान
सिकलापुर के फर्नीचर कारोबारी गौरव गर्ग के मुताबिक ब्रिटिश शासनकाल से बरेली में लकड़ी का काम चल रहा है। यहां बने फर्नीचर की अपनी अलग पहचान है। उत्तराखंड के नजदीक होने की वजह से बरेली में साल, सागौन, शीशम की लकड़ी पर्याप्त मात्रा में मिलती है। महानगरों के मुकाबले बरेली का फर्नीचर सस्ता और टिकाऊ होता है। कीमत में करीब 40 फीसदी का फर्क होता है। इस वजह से इसकी अलग पहचान है।
नहीं लगती प्लाई, न मिक्सिंग का खेल
सौ फुटा के फर्नीचर कारोबारी अमित अग्रवाल के मुताबिक, बरेली में तैयार फर्नीचर में प्लाई का इस्तेमाल नहीं होता। इससे डिजाइन का कोई भाग खुलकर अलग नहीं होता। एक ही तरह की लकड़ी का प्रयोग होता है। इसमें मिक्सिंग नहीं की जाती। तराई क्षेत्र होने से यहां की लकड़ी मजबूत होती है। घुन और दीमक भी कम लगते हैं। पीयू पॉलिश की चमक 15-20 वर्षों तक बरकरार रहती है।
देशभर में है प्लाईवुड की मांग
फरीदपुर औद्योगिक एसोसिएशन के अध्यक्ष प्लाईवुड कारोबारी गुरप्रीत सिंह के मुताबिक, ओडीओपी में फर्नीचर उद्योग शामिल होने से इसे वैश्विक पहचान मिलेगी। इससे किसानों को भी फायदा होगा। बरेली में तैयार प्लाईवुड की मांग भी देशभर में है। फिलहाल, करीब 500 लोग फर्नीचर का कारोबार कर रहे हैं। इनमें 50 बड़े कारोबारी हैं।
शहर में बनने वाले फर्नीचर और उनकी खासियत
- नागफनी सोफा : इसकी कारीगरी हाथ से की जाती है। सिर्फ शीशम की लकड़ी का इस्तेमाल होता है।
- डबल बेड : शीशम और सागौन की लकड़ी से बनाए जाते हैं। हाथ की कारीगरी होने से ये सालों-साल चलते हैं।
- डाइनिंग टेबल : शीशम की लाल लकड़ी से तैयार नक्काशीदार डाइनिंग टेबल की मांग सर्वाधिक है।
- ड्रेसिंग टेबल : सागौन की लकड़ी से करीब 40 डिजाइन में बनते हैं। धनुषाकार डिजाइन की मांग सर्वाधिक है।