सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला
दरगाह आला हज़रत की ओर से जारी बयान में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह स्पष्ट कर चुका है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1978) मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि इस तरह की कार्रवाई नागरिकों की आज़ादी को दबाने के समान है।
मुकदमों की वापसी और धार्मिक स्वतंत्रता की अपील
जमात रज़ा-ए-मुस्तफ़ा ने कानपुर प्रशासन से मांग की है कि निर्दोष युवकों पर दर्ज मुकदमा तत्काल प्रभाव से वापस लिए जाया। संगठन ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता की धाराएं तभी लागू होती हैं जब जानबूझकर किसी धर्म का अपमान किया गया हो, जबकि 'आई लव मुहम्मद' लिखना किसी भी धर्म का अपमान नहीं है, बल्कि यह एक सकारात्मक और प्रेमपूर्ण संदेश है।
दरगाह आला हज़रत ने सरकार से अपील की कि देश में धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी सुनिश्चित की जाए, ताकि किसी भी समुदाय के लोगों को अपने धार्मिक प्रेम और आस्था को प्रकट करने से रोका न जा सके। भारत का संविधान सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि दरगाह आला हज़रत हमेशा संविधान और न्याय की रक्षा के लिए आवाज़ उठाता रहेगा।