बदहाल उद्योग-3
जिले में जरी का हुनर और कारोबार लगभग पूरी तरह से चौपट हो गया है। दलालों ने इस घर-घर के उद्यम पर ऐसा कब्जा किया कि कला की गुणवत्ता ही गायब हो गई। एक्सपोर्टर ने माल लेना बंद कर दिया। आज स्थिति ये है कि बचे हुए कारीगर और उनका परिवार दो जून की रोटी जुटाने के लिए मशक्कत कर रहा है।
जरी जरदोजी पर नेताओं ने खूब लफ्फाजी और घोषणाएं कर कारीगराें को सब्जबाग दिखाए। दलालों ने इससे बढ़कर काम किया। आज स्थिति ये है कि बरेली जिले से बेहतरीन हुनर पंजाब, दिल्ली, मुंबई, हरियाणा और गुलाबी नगरी जयपुर की ओर पलायन कर गया। पलायन करने वाले परिवारों को कारीगर दूसरे प्रदेशाें में ठीकठाक धंधा कर रहे हैं। स्थिति ये है कि बरेली की जगह जयपुर इंटरनेशनल मार्केट बनता जा रहा है, क्याेंकि बरेली में किसी भी सरकार ने न कोई मार्के ट दिया और न ही कोई कच्चे माल की व्यवस्था कराई। जरी जरदोजी के विकास के नाम पर भले ही हर वर्ष करोड़ों रुपये बहाए गए, लेकिन बरेली का नाम सिर्फ कागजाें पर ही दिखा।
- बदहाल कारीगर
कहने को तो ढाई से तीन लाख लोग जरी कला से जुड़े हुए हैं लेकिन हकीक त कुछ और है। ये आंकड़े नेता और दलाल प्रचारित जरूर करते हैं जबकि सरकारी कागजों में आंकड़े कुछ और बोल रहे हैं। सरकारी आंकड़ों में 29 हजार लोग जरी कारोबार से जुड़े हैं। कारीगर हर दिन औसतन दो से ढाई सौ रुपये कमा पा रहा है, उनके हुनर का पूरा लाभ बिचौलिए उठा रहे हैं।
सस्ते में बिका हुनर
बरेली से पलायन करने वाले जरी कारीगरों की आर्थिक स्थिति में सुधार आ रहा है। इसका अंदाजा इससे ही लगता है कि जिले से हर दिन जयपुर के लिए करीब 50 अवैध यात्री बसें दौड़ती हैं। इनमें ज्यादातर यात्रा करने वाले कारीगर होते हैं। जो जिले में संघर्ष से कारीगरी कर रहे हैं उन्हें घर चलाना मुश्किल हो रहा है।
विदेश पहुंची कारीगरी
जिले से तमाम जरी कारीगर दुबई और अरब देशों में अपना हुनर दिखा रहे हैं। बिचौलिओं ने नोट बंदी के दौरान पांच सौ से ज्यादा जरी कारीगर अरब देशों में भेजे। पुराना शहर से 70 से ज्यादा कारीगर गए हुए हैं। नईम और आरिफ के परिजनों ने बताया कि दुबई में काम मिलने के बाद उनकी आय में इजाफा हुआ है। इसी तरह जयपुर आदि शहरों के लोगों का कहना है कि उन्हें वहां हर दिन औसतन पांच सौ रुपये दिहाड़ी मिल जाती है, छुट्टी और किराया भी मिलता है।
- कलस्टर और प्रशिक्षण केंद्र सिर्फ हवा हवाई
हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए सिविल लाइंस इलाके में अर्बन हाट बनाया गया। इस पर भी दलाल हावी हैं। शिल्पकारों को कोई लाभ नहीं मिल पाया है। केंद्रीय कपड़ा मंत्री संतोष गंगवार और यूपी लघु उद्योग मंत्री भगवत सरन गंगवार ने कई योजनाएं घोषित की थीं। जो आज भी कागजों तक सीमित नहीं हैं। मेगा कलस्टर योजना में जरी उद्योग भी विकसित होना था और कारीगरों के लिए ट्रेनिंग और मार्केट उपलब्ध कराना था जो सिर्फ हवा हवाई ही साबित हुआ है।
- नोट बंदी में खूब चली करेंसी
नोट बंदी में एक्सपोर्टर और बिचौलिओं ने जमकर पुरानी करेंसी खपायी थी। इन लोगों ने हजारों कारीगरों के खातों में पुराने नोट जमा कराए थे।
दलाल हाबी है, महंगा सामान है। नई बस्ती, मोहन तालाब, गौंटिया, चक, वाकर गंज और आसपास इलाकोें में 25 हजार से ज्यादा परिवार जरी कारोबार से जुड़े थे। घरों में लगने वाले अड्डे धीरे कम होते जा रहे हैं, काम नहीं मिलने से इन इलाकों में कारीगर विकल्प तलाश रहे हैं।
- मतलूब खां, कारीगर
सिर्फ कागजी घोषणाएं हुई और योजनाएं बनती रही हैं। जिले में तीन लाख से ज्यादा लोग जरी कारीगरी से जुड़े हैं, उनके परिवार की शिक्षा और कामकाज के लिए लोन योजना नहीं बनी, इससे दलाल मौज में रहे। परिचय पत्र तक नहीं पहुंचे हैं।
- मुख्तार अहमद, कारीगर
तीन हजार करोड़ का कारोबार, एक्सपोर्टर एक भी नहीं
यह हैरत में डालने वाला है कि बरेली से जरी कारोबार तो तीन हजार करोड़ का माना जाता है लेकिन एक्सपोर्टर बरेली में एक भी नहीं बैठा है। दूसरे शहरों के एक्सपोर्टर बरेली के जरी कारीगरों का इस्तेमाल सिर्फ मजदूरी में कर रहे हैं।
जरी कारोबार तीन हजार करोड़ रुपये वार्षिक
कुल कारीगर तीन लाख से ज्यादा
पंजीकृत हस्तशिल्पी 29 हजार