चेन से बांधा गया मानसिक बीमारी से पीड़ित
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मानसिक बीमारी से पीड़ित किसी भी व्यक्ति को बेड़ियों में जकड़ने के मामले को सुप्रीम कोर्ट ने बेहद गंभीरता से लिया है। बदायूं शहर में ऐसे व्यक्तियों को बेड़ियों में रखने के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। इस मामले की सुनवाई अब 7 जनवरी को होगी।
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने पिछले दिनों इस मामले में उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने बदायूं का भी उल्लेख किया था।
उन्होंने कहा था कि वहां पर एक धर्मस्थल में मानसिक बीमारी से ग्रस्त लोगों को इलाज के नाम पर बेड़ियों में जकड़कर रखा जाता है, जो किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन है।
इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए नोटिस जारी किया है। पीठ ने कहा है कि इस तरह का कृत्य केवल अमानवीय ही नहीं बल्कि ऐसे व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ भी है।
किसी भी हाल में व्यक्ति को बेड़ियों में जकड़ना न केवल गलत है, बल्कि मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है। बदायूं में ऐसा हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट में मैंने याचिका दायर की थी, जिस पर यह आदेश हुआ है।
गौरव कुमार बंसल, याचिकाकर्ता
धर्मस्थल पर जो भी ऐसे लोग आते हैं, वे आस्था की वजह से आते हैं। कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होता है जो किसी को बेड़ियों में जकड़ने को मजबूर करे। बेड़ियों में जकड़ने के पीछे पीड़ित परिवार की यह सोच होती है कि यह कहीं जा नहीं सकता और वह जल्द सही हो सकता है। इसी सोच के साथ परिजन पीड़ित को ऐसा कराते हैं। पीड़ित किसी भी धर्म का हो सकता है।
मोहम्मद उमर, अधिवक्ता
यदि किसी ऐसे व्यक्ति को बेड़ियों में जकड़कर रखा जाता है तो मानवीयता के विरुद्ध है। हां, कुछ तत्व ऐसे होते हैं जो इलाज के नाम पर मानसिक रूप से ग्रस्त लोगों को बेड़ियों में जकड़कर रखते हैं। उनके परिवार वालों से रकम वसूलते हैं।
सैयद ऐनुल हुदा नकवी, अधिवक्ता
किसी भी धार्मिक स्थल पर अगर किसी व्यक्ति को बेड़ियों में जकड़कर रखा जाता है तो यह इंसानियत के खिलाफ है। हम ऐसे किसी भी कार्य की भर्त्सना करते हैं।
-रोशन यासीन नकबी उर्फ गुड्डू, अधिवक्ता