बरेली। रुहेलखंड विश्वविद्यालय के पादप विज्ञान विभाग के डॉ. पंकज कुमार अरोड़ा और उनकी टीम ने पर्यावरण प्रदूषण के नियंत्रण में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। शोधकर्ताओं ने बैसिलस सेफेंसिस स्ट्रेन डीएच-7 नामक बैक्टीरिया का उपयोग कर पेट्रोलियम प्रदूषक डाइबेंजोथायोफीन (डीबीटी) का तीव्र जैव-अपघटन किया है। इस प्रक्रिया में डीबीटी का 36 घंटे के भीतर पूर्ण खनिजीकरण सफलतापूर्वक स्पष्ट किया गया है।
अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने 12, 24 और 36 घंटे के अंतराल पर नमूने एकत्र किए। इन नमूनों का गैस क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री (जीसी-एमएस) विश्लेषण किया गया। 12 घंटे पर केवल मूल यौगिक डीबीटी का संकेत मिला। 24 घंटे पर डीबीटी के साथ इसके मध्यवर्ती उत्पाद डाइबेंजोथायोफीन-5-ऑक्साइड, डाइबेंजोथायोफीन-5-डाइऑक्साइड और बेंजोएट की पहचान हुई। इससे स्पष्ट हुआ कि बैक्टीरिया सक्रिय रूप से डीबीटी का अपघटन कर रहा था।
36 घंटे के नमूनों में जीसी-एमएस विश्लेषण के दौरान डीबीटी या उसके किसी भी मध्यवर्ती उत्पाद का पता नहीं चला। यह परिणाम बैसिलस सेफेंसिस स्ट्रेन डीएच-7 द्वारा डीबीटी के पूर्ण खनिजीकरण को सिद्ध करता है। इससे यह भी प्रमाणित हुआ कि बैक्टीरिया के विकास के साथ प्रदूषक का प्रभावी अपघटन होता गया।
सल्फरयुक्त पेट्रोलियम प्रदूषकों से दूषित मिट्टी व जल का जैव उपचार संभव
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह खोज सल्फर-युक्त पेट्रोलियम प्रदूषकों से दूषित मिट्टी और जल के जैव-उपचार के लिए महत्वपूर्ण है। यह एक प्रभावी और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित करने में सहायक हो सकती है। भविष्य में इस बैक्टीरिया का उपयोग औद्योगिक अपशिष्ट की सफाई के लिए किया जा सकता है। तेल रिफाइनरी क्षेत्रों में भी इसका प्रयोग संभव है। अन्य हाइड्रोकार्बन-प्रदूषित स्थलों के उपचार के लिए भी यह तकनीक उपयोगी सिद्ध होगी।