अजीत प्रताप सिंह
बरेली। असम, त्रिपुरा और मिजोरम के बाद अब जानलेवा अफ्रीकन स्वाइन फीवर (एएसएफ) का अब बरेली में भी एक मामला सामने आया है। यहां पिछले दिनों एक सुअर की संदिग्ध बीमारी से मौत होने पर उसका सैंपल जांच के लिए भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) भेजा गया था। इसकी एएसएफ की आरटीपीसीआर जांच पॉजिटिव मिली है। आईवीआरआई ने मुख्य पशुचिकित्साधिकारी को पत्र भेजकर अलर्ट जारी करने को कहा है।
आईवीआरआई कैडरेड के संयुक्त निदेशक डॉ. केपी सिंह ने बताया कि पिछले दिनों नवाबगंज तहसील क्षेत्र के गांव भंडसर डंडिया के पशु पालक डॉ. अनिल कुमार ने एक मृत सुअर का सैंपल जांच के लिए आईवीआरआई भेजा था। केस हिस्ट्री में बताया गया कि सुअर को कुछ दिनों से तेज बुखार था। उसने खाना-पीना छोड़ दिया था और बेहद कमजोर हो गया था। उसका इलाज भी कराया गया, लेकिन दवाओं का असर नहीं हुआ और उसकी मौत हो गई। सुअर की बीमारी का पता लगाने के लिए उसके सैंपल की जांच जरूरी है। सैंपल की जांच की गई तो अफ्रीकन स्वाइन फीवर की पुष्टि हुई। मामला गंभीर होने पर आईवीआरआई से एक टीम गांव पहुंची। उसने फार्म का जायजा लिया। संक्रमण से अन्य सुअरों को बचाने के लिए दिशानिर्देश दिए।
पशुपालक ने बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर ही संबंधित सुअर को तत्काल क्वारंटीन कर देने की जानकारी दी। फार्म के अन्य सुअरों में फिलहाल एएसएफ के लक्षण नहीं हैं पर लक्षण दिखाई देने पर तत्काल उन्हें भी क्वारंटीन करने को कहा गया है। उधर, जानलेवा रोग की पुष्टि होने के बाद मुख्य पशु चिकित्साधिकारी को पत्र भेजकर जिले के सभी सुअर पालकों को एडवाइजरी अलर्ट जारी करने के लिए कहा है।
एक किमी का दायरा संक्रमित जोन घोषित
आईवीआरआई निदेशक डॉ. त्रिवेणी दत्त के मुताबिक भारत सरकार से जारी एडवाइजरी के तहत जिस इलाके में एएसएफ की पुष्टि होती है, उसके एक किलोमीटर के दायरे को संक्रमित जोन घोषित कर दिया जाता है और इस सीमा में आने वाले सभी सुअरों को संदिग्ध मानकर उन्हें क्वारंटीन कर दिया जाता है। क्षेत्र में अन्य पशुओं का आवागमन प्रतिबंधित होता है। एएसएफ की वैक्सीन बनाने के लिए आईवीआरआई के निशाद विभाग की ओर से शोध किए जा रहे हैं पर अब तक वैक्सीन नहीं बन सकी है। फिलहाल यह रोग लाइलाज और बेहद संक्रामक है।
मनुष्य नहीं होते संक्रमित पर सुरक्षा जरूरी
डॉ. दत्त के मुताबिक संबंधित वायरस से मनुष्यों को खतरा नहीं है पर जो पशुपालक या कर्मचारी संक्रमित सुअर के संपर्क में रहते हैं या देखरेख का जिम्मा संभालते हैं, उनके जरिये वायरस दूसरे पशुओं में फैल सकता है। एएसएफ प्रभावित फार्म या पशु के संपर्क में रहे लोगों के किसी दूसरे फार्म में जाने पर प्रतिबंध होता है। वे अगर अपने फार्म के भी अंदर जाएं या बाहर आएं तो उन्हें बायो सेफ्टी नियमों का पालन करना होता है। नहाकर कपड़े, जूते, गमझे बदलकर फार्म में जाना होता है, बाहर निकलने पर भी यही प्रक्रिया अपनानी होती है।
अफ्रीकन स्वाइन फीवर के लक्षण
एएसएफ घरेलू और जंगली पशुओं में होने वाला बेहद संक्रामक रक्तस्रावी वायरल रोग है। यह एसफेरविरिडे फैमिली के एक बड़े डीएनए वाले वायरस की वजह से होता है। पहली बार 1920 में अफ्रीका में इस वायरस की चपेट में पशु आए थे। इससे पीड़ित पशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर मौत निश्चित है। पीड़ित सुअर में तेज बुखार, लड़खड़ा कर चलना, सफेद सुअर के शरीर पर नीले चकत्ते होना, सुस्ती, खाना-पीना छोड़ना, नाक, आंख से पानी निकलना आदि इसके लक्षण हैं।
कैसे फैलता है अफ्रीकन स्वाइन फीवर
पशुओं में यह बीमारी संक्रमित घरेलू या जंगली सुअरों के संक्रमण से होती है। अप्रत्यक्ष संपर्क जैसे खाद्य पदार्थ, अवशिष्ट या कचरे के अलावा सुअर के मांस, स्लाइवा, खून और टिश्यू से भी फैल सकता है। अगर किसी पिगरी फार्म वाले सुअर में यह वायरस पाया जाता है तो यह तेजी से अन्य को चपेट में ले लेता है। लिहाजा, सुअरों की जांच कराकर उसमें से सुरिक्षत को अलग और संक्रमित को अलग कर क्वारंटीन किया जाना ही विकल्प है। फार्म वाले सुअर की रोग प्रतिरोधक क्षमता जंगली और देसी सुअर से कम होती है।
सुझाव : ना खाएं सुअर का आयातित मांस
भंडसर का सुअर संक्रमण की चपेट में कैसे आया, फिलहाल इस बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी है। हालांकि, विशेषज्ञ किसी संक्रमित सुअर के संपर्क में रहे व्यक्ति, वस्तु, आयातित मांस, पशु आहार, पशधुन, वाहन आदि सेबरेली में वायरस पहुंचने की आशंका जता रहे हैं। बताया कि एएसएफ की चपेट में आने से म्यांमार, बांग्लादेश के अलावा देश के पूर्वोत्तर राज्यों समेत उत्तर प्रदेश के भी कुछ जिलों में सुअरों की मौत हुई है। वायरस का प्रकोप थमने तक लोगों से सुअर का आयातित मांस न खाने की अपील की है।