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गुलाब की खुशबू विदेशों तक- - खेतों में उग हो रहे दमश्क गुलाब तेल दस लाख रुपये लीटर

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बरेली। जो लोग कहते हैं कि खेती-किसानी में पैसा नहीं है उन्हें शायद पता नहीं कि जमाने के साथ खेती कितना बदल चुकी है। नए जमाने की खेती में गेहूं-धान जैसी परंपरागत फसलों के बजाय गुलाब, खस, मेंथा और हर्बल चाय पत्ती कई ऐसी औषधीय फसलें शामिल हैं जिनके उत्पाद देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक में धूम मचा रहे हैं। अमेरिका, फ्रांस और अरब देशों की मांग की वजह से दमिश्क गुलाब के तेल की कीमत तो 10 से 12 लाख रुपये लीटर तक है। गुजरे कुछ सालों में बरेली में भी यह नई तरह की खेती-किसानी खूब उन्नत हुई है। पंतनगर विश्वविद्यालय के रिटायर्ड वैज्ञानिक डॉ. जेपी सिंह ने रिठौरा के गांव भड़सर में अपने फार्म को सुगंधित और औषधीय फसलों का मॉडल बनाया है। अमर उजाला ने डॉ. सिंह के फार्म पर उनसे बातचीत कर नए जमाने की इस खेती के बारे में विस्तार से बातचीत की। पेश है रिपोर्ट-
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दमिश्क गुलाब के उत्पादों की विदेशों में धूम
खेती के बदलते ट्रेंड के साथ गुलाब की फसल सबसे ज्यादा फायदे का सौदा बनी है। डॉ. सिंह के मुताबिक दुनिया भर में गुलाब की पांच सौ से ज्यादा प्रजातियां हैं। भारत में दमिश्क गुलाब की बहुतायत है और इसकी मांग भी सबसे ज्यादा है। इस गुलाब से तैयार एक लीटर तेल की कीमत 10 से 12 लाख रुपये तक है जिसका खासतौर पर इस्तेमाल इत्र और फेस क्लीनर के साथ चेहरे की झुर्रियां दूर करने वाले प्रसाधनों में होता है। शरबत, सुगंध, गुलाब जल जैसी आम उत्पादों के साथ अनिद्रा, तनाव, मोटापा और सिरदर्द दूर करने की औषधियां भी इसी तेल से बनती हैं। एक लीटर तेल करीब पांच हजार किलो फूलों से तैयार होता है। डॉ. सिंह के मुताबिक बरेली की जलवायु इस गुलाब की खेती के लिए बेहद अनुकूल है। साल में इसकी दो फसलें तैयार हो जाती हैं।
तुलसी के पत्तों में जीवनवर्धक औषधियां
तुलसी की दो सौ से ज्यादा प्रजातियां हैं। इसमें यूजिनॉल, मिथाइल चेविकॉल, कैल्शियम लिनालूल, सिट्रॉल, फास्फोरस, प्रोटीन, कैंफर जैसे कई जैविक रसायन और कार्बोहाइड्रेट, फाइबर और विटामिन अच्छीखासी मात्रा में होते हैं। इसी वजह से हजारों सालों से इसका इस्तेमाल औषधियों में होता आया है। बरेली समेत आसपास के कई जिलों में बड़े पैमाने पर इस औषधीय फसल की खेती होती है। डॉ. सिंह बताते हैं कि तुलसी का पत्ता अपनी गुणवत्ता के मुताबिक 50 से 200 रुपये किलो तक बिकता है।
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फ्रेंच परफ्यूम में इस्तेमाल होती है खस
खस के तेल का इस्तेमाल इत्र, साबुन और कॉस्मेटिक्स के साथ पान मसाला होता है। तेल शोधन के बाद बची हुई घास कूलर में लगाने के काम आती है। इस तरह खस की खेती हर लिहाज से फायदे का सौदा है। खस के एक लीटर तेल की कीमत एक से डेढ़ लाख रुपये किलो तक होती है। इस तेल की सर्वाधिक मांग दुबई और फ्रांस में है जहां इससे कीमती परफ्यूम बनाए जाते हैं। खस की आठ प्रजातियां हैं जिनमें से ज्यादातर की पैदावार बरेली में होती है।
लेमन घास लगाएं, छह साल फसल पाएं
लेमन यानी नींबू घास भी बरेली में खेती खूब हो रही है। एक बार इसकी पौध लगाने के बाद छह साल तक उसे दोबारा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। फसल का उत्पादन भी एक साल में तीन बार होता है। डॉ. सिंह के मुताबिक एक एकड़ में यह फसल 80 से 100 किलो तक पैदावार देती है। इसके तेल का मार्केट रेट आमतौर पर एक हजार रुपये के आसपास रहता है जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से साबुन बनाने में होता है। इसकी पत्तियों से चाय भी बनती है।
मेंथा की नई प्रजाति गोल्डन शिवालिक
शिवालिक प्रजाति के मेंथा का उत्पादन तो कई सालों से हो रहा है लेकिन गोल्डन शिवालिक नाम की एक खास प्रजाति वैज्ञानिक डॉ. जेपी सिंह ने अपने फार्म पर विकसित की है। गोल्डन शिवालिक की मांग तो सबसे ज्यादा है ही, इसका उत्पादन भी दूसरी मेंथा फसलों के मुकाबले ज्यादा होता है। पड़ोस के उत्तराखंड में ही इसकी अच्छीखासी मांग है। इसका एक एकड़ में 80 से सौ किलो तक उत्पादन होता है। फसल चार महीनों तैयार हो जाती है। इसका एक लीटर तेल 13 सौ रुपये किलो तक बिकता है। डॉ. सिंह बताते हैं कि भारत मेंथा का सबसे बड़ा उत्पादक है। विश्व के करीब 87 प्रतिशत बाजार पर भारत का कब्जा है। इसका इस्तेमाल कफ सीरप, बेव्रेज, टूथ पेस्ट, पिज्जा, शराब आदि में किया जाता है।
और भी हैं कई औषधीय फसलें
पामारोजा, सिट्रोनेला, कैमोमिल यानी गुल बबूना समेत कई और औषधीय फसलें हैं जिनकी खेती भी बरेली में की जा रही है। जिरेनियम की खेती पहले सिर्फ पहाड़ों पर होती थी जिसे अब डॉ. जेपी सिंह बरेली में भी कर रहे हैं। इसके तेल का इस्तेमाल भी पान मसाला और इत्र में होता है। डॉ. सिंह के फार्म पर मच्छर घास यानी सिट्रोनेला की भी पौध तैयार होती है। पांच साल तक पैदावार देने वाली इस फसल का उत्पादन एक एकड़ में 80 से 100 किलो तक होता है और इसका तेल एक हजार रुपये लीटर तक बिकता है। इसका इस्तेमाल मलेरिया की दवाओं में होता है। गुल बूबना के सूखे फूल हर्बल चाय में इस्तेमाल होते हैं और इसका तेल भी बनता है जिसकी मांग कई फ्रेशनर, कैंफर आदि कारोबार में है। इसकी पत्तियां तीस हजार रुपये क्विंटल तक बिकती हैं।

बरेली की औषधीय खेती की पहचान विदेशों तक है। अच्छी देखभाल की जरूरत तो होती है लेकिन ये फसलें कम लागत पर ज्यादा लाभ देती हैं और किसानों की आय का अच्छा साधन बन सकती हैं। - डॉ. जेपी सिंह
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