बरेली। खेल के मैदान पर सफलता पाने के लिए मेहनत, अनुशासन और जुनून सबसे बड़ा हथियार होते हैं। यही वजह है कि तमाम परेशानियों और विपरीत परिस्थिति के बावजूद शहर के खिलाड़ी एथलेटिक्स में लगातार उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं। न तो संसाधनों की कमी और न आर्थिक तंगी उनके हौसले को कम कर पाई। इन खिलाड़ियों का मानना है कि यदि मन में मजबूत इच्छाशक्ति हो तो हर बाधा को पार किया जा सकता है। संवाद
इनामी राशि से जुटाते हैं प्रतियोगिता का खर्च
सैनिक कॉलोनी निवासी 23 वर्षीय पुनीत बचपन से भारतीय सेना में भर्ती होने का सपना देखते थे। इसके लिए उन्होंने वर्षों तक मेहनत की। लेकिन ओवरेज होने से उनका यह सपना अधूरा रह गया। उन्होंने हार न मानते हुए तीन हजार मीटर स्टीपल चेज में पूरी लगन के साथ अपने खेल सफर को आगे बढ़ाया। पुनीत ने खेल को अपनी पहचान बनाने का निर्णय लिया और छोटी-बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया। वे बताते हैं कि इन प्रतियोगिताओं की इनामी राशि से ही वे अगली प्रतियोगिता का खर्च जुटाते हैं। खेलने के लिए कोई प्रायोजक न होने के कारण उन्हें यात्रा, रहने और प्रशिक्षण का सारा इंतजाम खुद करना पड़ता है। अच्छे जूते और पौष्टिक आहार वे नहीं ले पाते हैं। बावजूद इसके वे अपने अभ्यास में कोई कमी नहीं छोड़ते और दिन-रात मेहनत करते हैं। पुनीत दिल्ली में आयोजित ओपन स्टेट में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं।
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सुन-बोले नहीं सकते गुड्डू... लेकिन प्रतिभा ने मचाया शोर
कर्मचारी नगर निवासी गुड्डू की कहानी भी प्रेरणादायक है। गुड्डू सुन और बोल नहीं सकते, लेकिन उनकी प्रतिभा और खेल के प्रति जुनून किसी भी सामान्य खिलाड़ी से कम नहीं है। 10 और पांच हजार की दौड़ में उनका जोश और प्रदर्शन देखने लायक है। गुड्डू के पिता महेंद्र पाल गैस एजेंसी से जुड़े हैं और घर-घर सिलिंडर पहुंचाने का काम करते हैं। बेटे को प्रतियोगिताओं में भेजने के लिए वे कई बार कर्ज लेते हैं और घर का सामान गिरवी रखते हैं। बेटे की प्रतिभा को सही दिशा देने के लिए वे हर संभव प्रयास करते हैं, चाहे इसके लिए कितनी भी मुश्किल का सामना क्यों न करना पड़े। कभी-कभी संसाधनों की कमी राह में बाधा बन जाती है, लेकिन बेटे के सपनों के आगे यह सब छोटा है। वह गुड्डू की उपलब्धियों का श्रेय कोच अजय कश्यप को देते हैं। गुड्डू ने केरल में आयोजित डेफ नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में दो पदक अपने नाम किए थे।