बरेली। बीडीए की अवस्थापना निधि से ट्रांसपोर्ट नगर में बनी हाटमिक्स सड़कें तीन महीने भी नहीं चलीं। नाम मात्र का ट्रैफिक होने के बाद भी सड़क की ऊपरी सतह बनते ही उधड़ने लगी तो ठेकेदार ने मिक्स होल लगाने के बाद शील कोड बिछाकर जैसे-तैसे मरम्मत की खानापूरी कर दी और 36 लाख का भुगतान करा लिया। अगर ठीक ठाक बरसात हो गई तो सड़कें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाएंगी।
2012-13 में बीडीए की अवस्थापना निधि से 639.28 लाख के कामों को मंजूरी मिली थी। इनमें ट्रांसपोर्ट नगर में 44.35 लाख की लागत से सड़कों की रिपेयरिंग और सुदृढ़ीकरण का काम स्वीकृत किया गया। सड़कों का एस्टीमेट मंजूर करने से टेंडर निकालने तक में हुए खेल किया गया। ठेकेदार के टेंडर उसी रेट में स्वीकृत हो गए जितनी कि सड़क निर्माण की लागत थी। सोची समझी योजना के तहत टेंडर पूल कराए गए। इसका रिजल्ट ये निकला कि इंजीनियरों के खास ठेकेदार को टेंडर मिल गए।
ठेकेदार ने करीब तीन महीने पहले ट्रांसपोर्ट नगर में टुकड़ों में सड़कों का निर्माण कराया। सड़कों की ऊपरी सतह जब खराब होने लगी तो उस पर मिक्स होल लगाकर शील कोड बिछाया गया। एक रिटायर्ड इंजीनियर के मुताबिक ट्रांसपोर्ट नगर की सड़कों की मोटाई मानक से कम रखने के साथ इनमें तारकोल का इस्तेमाल भी कम किया गया। इस वजह से मामूली ट्रैफिक होने के बाद भी सड़कों की ऊपरी सतह उधड़ने लगी। निर्धारित मानक से कम गुणवत्ता में बनी ट्रासंपोर्ट नगर की सड़कों का बरसात बाद क्या हाल होगा। इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
10 साल से जमे हैं इंजीनियर
बीडीए में आधा दर्जन से ज्यादा जेई और एई पिछले 10 या 12 साल से जमे हैं। एई रमन कुमार 1991 में जेई बनकर आए थे। यहीं पर जमे रहे। 2008 में प्रमोशन पाकर एई भी यहीं बन गए। आरके सिंह 2002 में आए थे। इनको 12 साल हो चुके हैं। एई कृपाल सिंह की तैनाती 2004 में हुई थी वहीं विजय सिंह 2005 से यहीं डटे हैं। नक्शा पास कराने से लेकर अवैध निर्माण और अन्य कामों में खेल के चलते अफसरों की भी इन पर कृपा बनी हुई है।
कोट
ट्रांसपोर्ट नगर की सड़कों में कोई खराबी नहीं है। ये तो हम जैसे टेक्निकल लोग ही बताएंगे कि सड़कें ठीक बनी हैं या खराब। जब हम कह रहे हैं कि सड़कें ठीक हैं तो समझो उनमें कोई कमी नहीं है। बीडीए की जितनी भी सड़कें बनी हैं, सबकी गुणवत्ता मानक के अनुरूप हैं।
-अजय सिंह, चीफ इंजीनियर बीडीए