बरेली। महंगाई और भ्रष्टाचार उनके लिए बड़े सवाल हैं ही और खुद से जुड़ीं वेतन विसंगतियां तथा सरकार की ढुलमुल नीतियां भी सरकारी कर्मचारियों और श्रमिकों के लिए इस चुनाव में बड़ा मुद्दा रहेंगी। वे आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाते हैं। सरकारी कर्मचारी नई पेंशन स्कीम कोकर्मचारियों में आपस में बांटने की साजिश करार देते हैं। वह चाहते हैं कि पुरानी वाली पेंशन स्कीम बहाल की जाए। असंगठित क्षेत्र के मजदूर भी 11 हजार रुपये मजदूरी और सम्मानजनक पेंशन सुविधा की ख्वाहिश रखते हैं।
शनिवार को अमर उजाला कार्यालय में श्रमिक शक्ति का चुनावी एजेंडा बनाने को मंथन में जुटे विभिन्न क्षेत्रों के कर्मचारियों और श्रमिकों के प्रतिनिधियों ने कहा कि जिस तरह से पूंजीवाद हावी है, उसमें श्रमिकों को उनका वाजिब हक नहीं मिल रहा है। श्रमिकों और उनके परिवार को बमुश्किल रोटी मिल जाती है। उनके पास इतना पैसा नहीं होता कि वह अपने बच्चों को शिक्षा दिला पाएं और परिवार के लोगों का इलाज करा सकें। इन दोनों मूलभूत आवश्यकताओं के लिए उसे पेट की रोटी काटनी पड़ती है। गरीबों-अमीरों के लिए अलग-अलग शिक्षा व्यवस्था, अलग-अलग सेहत की सुविधा ये भी पूंजीवाद पोषक शासन की देन है। श्रमिक प्रतिनिधियों ने एक स्वर में सबको नि:शुल्क और समान शिक्षा की नीति लागू करने की पुरजोर मांग रखी। उन्होंने कहा कि वह जाति, धर्म से परे हटकर ऐसा प्रतिनिधि चुनना पसंद करेंगे जो उनके हितों और बेहतर भविष्य की नींव रखने में समर्थ हो सके। सभी कर्मचारी प्रतिनिधि निजीकरण के भी विरोध में हैं।
मंथन के मोती
पुरानी पेंशन नीति बहाल की जाए। नई पेंशन योजना स्वीकार्य नहीं।
शासन ऐसी आर्थिक नीति लागू करे, जो गरीबी और अमीरी की खाई को पाटे।
संविदा और अस्थाई नियुक्तियों की जगह नियमित नियुक्तियां हों।
कर्मचारियों की रिटायरमेंट आयु सीमा समान हो, अलग-अलग न हो।
न्यूनतम वेतन की व्यवस्था हर हाल में लागू हो।
नियोजित औद्योगिक विकास हो।
पार्लियामेंट में मजदूरों-कर्मियों के लिए सीटें रिजर्व हों।
चुनाव का खर्च चुनाव आयोग वहन करे।
लैपटॉप नहीं मूलभूत सुविधाओं पर धन व्यय किया जाए
बरेली में उद्योगों को पुनर्जीवित करने की जरूरत
इनकी बात...
गरीबों और अमीरों के लिए समान सिस्टम और कानून बनें। राजनीति जाति, धर्म के बजाय गरीबी-अमीरी की खाई पाटने वाली हो। बरेली में औद्योगिक विकास बड़ा चुनावी मुद्दा बने, जिस पर रोजगार और विकास निर्भर है।
संजीव मेहरोत्रा, महामंत्री- बरेली ट्रेड यूनियन्स फेडरेशन
बरेली में किसानों से जबरन जमीनें छीनी गईं लेकिन अफसोस कोई नेता या जनप्रतिनिधि नहीं बोला, यह मुद्दे चुनाव में अहम होने चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य सबको बराबर तथा नि:शुल्क मिले, यह जरूरी है।
-डॉ. इसरार खां, मजदूर नेता एवं विवि में शिक्षक
बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाने के बजाय शासन-सत्ता और व्यवस्था पूंजीपतियों के हाथों में खेलती है। यह दुर्भाग्य की बात है, कर्मचारियों, किसानों और मजदूरों के हितों को दरकिनार कर दिया जाता है।
कमलेश त्रिपाठी, मंडल मंत्री- वरिष्ठ उपाध्यक्ष, राज्य कर्मचारी महासंघ
बरेली का विकास कर्मचारियों के चुनावी एजेंडे से बाहर नहीं हो सकता। इस शहर का सही मायने में विकास अब तक नहीं हो पाया है। जबकि यहां तमाम संभावनाएं हैं, विकास जो कराएगा उसी को जिताएंगे।
सलीम अहमद, जिला कोषाध्यक्ष- उप्र चतुर्थश्रेणी कर्मचारी महासंघ
अफसोस इस चुनाव में चेहरों के माध्यम से मुद्दों की हवा निकाली जा रही है। सारे दल एक सोची समझी राजनीति के तहत देश की जनता को गुमराह कर रहे हैं और जाति, धर्म के नाम पर हम सबको बांट रहे हैं।
अफरोज आलम, सेंट्रल काउंसिल ऑफ यूनियन
जब तक मजदूरों को उनकी मेहनत का प्रतिफल और किसानों को कृषि के लिए प्रोत्साहन नहीं मिलता, तब तक देश का सही मायने में विकास नहीं हो सकता। ऐसी नीतियां सबका चुनावी मुद्दा बननी चाहिए।
राजीव शांत, जिला मंत्री- खेत मजदूर मंडल
राजनीति ने मजदूर वर्ग को वोट बैंक के खाके में जकड़ रखा है। वह उसको जाति, धर्म में बांटे हुए हैं और एकजुट न होने देने की साजिश रचते रहते हैं। राजनीति में मजदूरों को भी प्रतिनिधित्व मिले।
लक्ष्मण सिंह राणा, अध्यक्ष मजदूर मंडल
आर्थिक विकास से पूरे देश और देश के हर वर्ग की समृद्धि जुड़ी है, इसलिए वही सरकार बननी चाहिए जो बेहतर आर्थिक नीतियां लागू कर सके। औद्योगिक विकास भी करे, जिससे रोजगार सृजित होंगे।
मुकेश पठानिया, उप महामंत्री- एसबीआई स्टाफ एसोसिएशन
भुखमरी, बेरोजगारी, महंगाई ने कमर तोड़ रखी है। आम आदमी और मजदूर रोजी-रोटी के लिए जूझ रहा है, ऐसे में बेहतर सरकार के चयन की जरूरत है, जो स्वच्छ और पारदर्शी सत्ता-व्यवस्था दे सके।
-अरुण कुमार, उप राज्य सचिव- केनरा बैंक कर्मचारी संघ
पुराने अनुभव अच्छे नहीं है, क्योंकि पुरानी सरकारों ने श्रमिक, कर्मचारियों और किसानों की बात ईमानदारी से नहीं की। बरेली को भी औद्योगिक विकास की जरूरत है।
संजय मेहरा, संयोजक यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स
नेता राजनीति मेें समाजसेवा के नाम पर आते तो हैं लेकिन पूरे देश से छल करते हैं। ऐसे नेताओं को दुबारा मौका नहीं मिलना चाहिए। भ्रष्टाचार बड़ी समस्या है, इसे दूर करने की कारगर नीति बनाने वालों को चुनेंगे।
मुकेश सक्सेना, मंडल अध्यक्ष- नरमू, रेलवे यूनियन
निजीकरण अभिशाप है और नई पेंशन स्कीम कर्मचारियों के लिए घातक है, जो इन्हें बदलने की बात करेगा, हम सारे श्रमिक और मजदूर उसके साथ हैं। कर्मचारियों के साथ किसानों का भी हित सुरक्षित होना चाहिए।
-बसंत चतुर्वेदी, मंडल मंत्री, एनई रेलवे मजदूर यूनियन्स
देश की भ्रष्ट हो चुकी राजनीति को बदलने के लिए सभी मजदूरों को इस चुनाव में एकजुटता के साथ अपनी ताकत प्रदर्शित करनी होगी। जाति और धर्म से परे ऐसे प्रतिनिधि चुनने होंगे जो अपेक्षित परिवर्तन कर पाएं।
रविंद्र कुमार, क्षेत्रीय मंत्री- उत्तर प्रदेश परिवहन निगम
प्रदेश में रिटायरमेंट की चार आयु निर्धारित हैं। किसी क्षेत्र में रिटायरमेंट 58 साल पर हो रहा है तो कहीं, 60, 62 और 65 है। यह विसंगति और अन्याय है। रिटायरमेंट की आयु समान होनी चाहिए।
सलमान जमीर, अध्यक्ष- डीआरडीए इम्प्लाइज यूनियन
बरेली में सरकारी मेडिकल कॉलेज की जरूरत है। स्वास्थ्य से जुड़ा एक बड़ा चुनावी मुद्दा बने। एक दिन के बजाय मतदान के लिए दो-तीन मौके मिलने चाहिए, तभी शत-प्रतिशत मतदान संभव है।
आलोक चौहान, प्रदेश महामंत्री- माध्यमिक शिक्षणेत्तर संघ
जो पूरे समाज के हितों को ध्यान रखे और ऐसी नीतियां बनाए जिससे हर जरूरतमंद का विकास हो, ऐसी सत्ता हमें चुननी है लेकिन पुराने अनुभवों से सबक भी लेना होगा कि किसने हमें लगातार छला है।
डॉ. केपी सिंह, जिलाध्यक्ष- उत्तर प्रदेश शिक्षामित्र संघ
श्रमिकों और कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन मिलना चाहिए। अस्थाई कर्मचारियों को स्थाई करने की अवधि भी कांटेक्ट के साथ तय होनी चाहिए। मजदूरों के साथ अन्याय करने वालों पर कड़ी कार्रवाई भी हो।
जितेंद्र मिश्रा, बरेली कॉलेज में अस्थाई कर्मचारियों के अध्यक्ष
विकास के लिए निचले तबके का उत्थान जरूरी है। उनके हितों के लिए सरकारी योजनाएं न सिर्फ बनें बल्कि उनका क्रियान्वयन भी पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त ढंग से कराया जाए।
रामलाल कश्यप, जिलाध्यक्ष- उत्तर प्रदेश पंचायत सफाई कर्मी
श्रम कानूनों का पूरी तरह से पालन होना चाहिए। इसके लिए सरकार को कड़े प्रावधान बनाने की जरूरत है। योजनाएं व्यावहारिक बनाएं। एक रुपये में कैसी सरकारी स्वास्थ्य सुविधा हमें दी जा रही है, सब जानते हैं।
-यशपाल सिंह, प्रतिनिधि- पीयूसीएल
देश की सबसे बड़ी आबादी कामगार मजदूरों की है लेकिन उनको ही अधिकारों से वंचित रखा गया है। न्यूनतम मजदूरी हर श्रमिक को अनिवार्य रूप से मिलनी चाहिए। कर्मचारियों के हितों की योजनाएं बनें।
जयप्रकाश, संयोजक- इंकलाबी मजदूर केंद्र
बेरोजगार, अशिक्षा और भ्रष्टाचार के इस दौर में व्यवस्था परिवर्तन होना चाहिए, जो हमें मूलभूत सुविधाएं दे सके। बेहतर नीतियां बननी चाहिएं और प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे जनता से होना चाहिए।
चंद्रपाल सिंह, अध्यक्ष- क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन
युवाओं के उत्थान, रोजगार की संभावनाएं विकसित करने से ही सही मायने में विकास होगा। सड़कों और पुलों के अलावा स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने वालों को चुनना चाहिए।
हरीशंकर- मंत्री, माध्यमिक शिक्षणेत्तर संघ