शहर की सड़कों की दशा सुधारने के लिए मंथन के दूसरे दिन ट्रक, बस आपरेटर्स और टेंपों यूनियन के लोगों की बारी थी। परोक्ष रूप में सबने माना कि दिक्कत उनकी वजह से भी है लेकिन जब वे अपनी दिक्कतें गिनाने लगे तो पूरी व्यवस्था की ही पोल पट्टी उधड़ने लगी। आरटीओ और पुलिस दो सबसे बड़े खलनायक के रूप में सामने आए। यहां तक कहा गया कि हमसे बदमाश पैसे नहीं मांगते लेकिन पुलिस और आरटीओ को हम गुंडा टैक्स दे रहे हैं। नगर निगम की बेरुखी पर भी सवाल उठे। लब्बोलुबाव ये कि डंडा चलाएंगे तो कुछ दिन कुछ बदलेगा फिर जैसा का तैसा हो जाएगा क्योंकि सिस्टम ऐसे ही चल रहा है।
आरटीओ और पुलिस कुछ ज्यादा ही मांग रहे हैं
ट्रक, ट्रांसपोर्ट, टेंपो और निजी बसों के यूनियन नेताओं ने जहां शहर की परेशानियों को स्वीकारा वहीं अपनी पीड़ा भी बतायी। लाखों की लागत से ट्रक खरीद कर व्यवसाय करने वाला एक शख्स उस वक्त कितना बेइज्जत महसूस करता है जब एक होमगार्ड उसे इस तरह ड्राइवर की सीट से ऐसे उतारता है जैसे वह कोई अपराधी है। पांच सौ रुपये चालान की बात तो सिर्फ डराने के लिए है होमगार्ड या सिपाही सौ रुपये लेकर गाड़ियों को नो एंट्री में घुसने की इजाजत दे देता है। सरकारी माल ढोना हो तो ओवरलोडिंग परिवहन विभाग के अधिकारी ही कराते हैं। हर जिले में आरटीओ ने एंट्री फीस (गुंडा टैक्स) निर्धारित कर रखी है। बसपा सरकार में बरेली में एंट्री फीस सात सौ रुपये थी। सपा की सत्ता आने पर 21 सौ रुपये कर दी गई। सीबीगंज के खाद्य गोदाम से करगैना तक जाने के लिए मिनी बाईपास और आईवीआरआई रोड होकर जाना पड़ता है। इससे दौ सौ रुपये का अतिरिक्त डीजल फुंकता है। प्रदूषण बढ़ता है सो अलग। दो सौ रुपये खर्च करने की जगह ट्रक वाले सौ रुपये सिपाही को देकर चौपुला चौराहे से होकर जाना ज्यादा ठीक समझते हैं। देहात के 85 किलोमीटर के दायरे में एक भी सीएनजी पंप नहीं है फिर भी आरटीओ देहात के नाम पर परमिट दिए जा रहे है, इस परमिट के लिए आठ से लेकर पंद्रह हजार रुपये अलग से लिये जाते हैं। टेंपो यूनियन वाले खुद मान रहे हैं कि शहर में सिर्फ 3500 के करीब टेंपो रजिस्टर्ड हैं लेकिन यहां देहात के मिला कर 6500 से ऊपर टेंपो हैं। इसके अलावा भी कई अवैध टेंपो हैं जिनका यूनियन वाले भी हिसाब नहीं रखते। सरकार ने प्रिवेंशन ऑफ डैमेज टू पब्लिक प्रॉपर्टी एक्ट के तहत ओवरलोड वाहनों व ट्रकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी किया है। बरेली ट्रक ओनर्स बेलफेयर एसोसिएशन ने इसकी सराहना की है। साथ ही आदेश का कड़ाई से पालन कराने के लिए प्रमुख सचिव को पत्र भेजा है। यह भी कहा गया कि आरटीओ और एआरटीओ ओवरलोडिंग के मामले में कार्रवाई नहीं करते हैं तो एसोसिएशन के पदाधिकारी और वाहन स्वामी खुद सड़कों पर उतरकर गाड़ियोें को घेरेंगे।
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कहां जाए ट्रक वाले?
ट्रक एसोसिएशन के पदाधिकारी बोले फुटपाथ तो रेहड़ी और ठेले वाले खा गए हैं, दुकानदारों ने अलग से अतिक्रमण कर सड़क घेर रखी है। ट्रक वाले कहां जाएं। हर बार ट्रक मालिकों को ही दोष दिया जाता है, जबकि उनके लिए शहर में ट्रक खड़ा करने के लिए कोई व्यवस्था तक नहीं की गई है। हां, ट्रांसपोर्ट नगर जरूर है, लेकिन वह शहर से इतना दूर है कि वहां जाना ही खर्च को बढ़ाना है। जब तक बड़ा बाईपास नहीं बनता उसकी उपयोगिता नहीं है। जब ट्रांसपोर्ट सर्विस शहर की गलियों में चल रही है तो ट्रक इतनी दूर खड़े क्यों करें। सभी ने एक साथ कहा कि अगर इन चार प्वाइंट्स पर ट्रांसपोर्ट नगर बसाया जाए तो शहर को काफी हद तक जाम और अतिक्रमण की समस्या से मुक्ति मिल जाएगी।
1 - करमपुर चौधरी के पास
2 - पीलीभीत बाईपास
3 - बदायूं रोड
4 - सीबीगंज
स्टैंड बनने से हो सकती है समस्या दूर
टेंपो के लिए ही जंक्शन के अलावा कहीं भी टेंपो के लिए जगह निर्धारित नहीं है। ऐसे में जहां-तहां अपनी मर्जी से अस्थायी स्टैंड बना लिए गए हैं। ऐसे अवैध स्टैंड चौराहा के पास किसी न किसी सड़क पर ही चल रहे हैं। सड़क किनारे ही34 छोटे स्टैंड बनाने को भी कई बार बात चली, मगर कुछ हुआ नहीं। स्टैंड तय होने से जगह-जगह रोककर सवारियां नहीं बैठाई जाएंगी। टेंपो क्रम से निकलते हैं और उन्हें सवारियां मिलती चली जाती हैं। वे रुककर इंतजार नहीं करते। घंटाघर वाले पार्क में इस तरह का स्टैंड होने का उदाहरण सामने है। बाकी जगह तो बुरा हाल रहता है। यह गुस्सा भी जाहिर किया गया कि टेंपो वालों से तमाम तरह के शुल्क लिये जाते हैं, मगर उन्हें सुविधाएं देने को कोई तैयार नहीं है। इसी तरह वर्षों से शाहजहांपुर रोड पर बीसलपुर बस अड्डा चल रहा है। यहां कई और लोग अपनी बसें खड़ी कर देते हैं कोई कुछ नहीं कर सकता।