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फागिंग पर भारी पड़ रहा मच्छरों का डंक

Thu, 18 Oct 2012 12:00 PM IST
Bareilly
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बरेली। एनाफिलीज के बाद अब एडिस मच्छरों ने डंक मारना शुरू कर दिया है। शहर में लगातार बढ़ रही मच्छरों की फोज से बरेलीवासी न केवल परेशान हैं बल्कि अस्पताल में पहुंचने लगे हैं। नगर निगम के स्टोर के आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक साल में शहर नगर निगम फॉगिंग में इस्तेमाल की जाने वाली मैलाथियान पर दो लाख और उसके साथ मिलाए जाने वाले डीजल पर चार लाख रुपए खर्च कर चुका है लेकिन शहर में बढ़ रही मच्छरों की तादाद कम नहीं हो रही। कालोनी के लोगों के मुताबिक फॉगिंग सिर्फ कागजों में ही हो रही है। ऐसे में दवा और डीजल कहां गया। हैरानी की बात यह है कि लाखों की दवा पीने के बावजूद मच्छरों पर कोई असर नहीं हो रहा है और शहर में मच्छर दिन-ब-दिन तंदुरुस्त हो रहे हैं या फिर यूं कहें कि कागजों में ही फॉगिग कर लाखों की दवा नगर निगम के अफसर पी गए।
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दूसरी तरफ नगर निगम दावा कर रहा है मच्छरों के आतंक से लोगों को बचाने के लिए फागिंग कराई जा रही है। मच्छर मारने के लिए सड़कों पर नीला धुंआ उड़ाने पर रोजाना हजारों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। नालों तथा नालियों में एंटी लार्वा दवा का छिड़काव भी किया गया। मच्छरों की शिकायतें लगातार मिलने पर निगम ने एक महीने का कार्यक्रम घोषित करके फागिंग अभियान शुरू कराया। निगम का दावा कर रहा है कि अब तक शहर के सौदागरान, इंग्लिशगंज, मलूकपुर, खन्नू, घेर शेखू मिट्ठू, बिहारीपुर मेमरान, नोमहला, रामबाग, गांधी उद्यान, सिविल लाइंस, स्वालेनगर, नंदौसी, मथुरापुर, जौहरपुर, खलीलपुर वार्डों में फागिंग कराई जा चुकी है। फागिंग पर रोजाना 4500 रुपये खर्च हो रहे हैं। मेलाथियान डीजल में मिलाकर फागिंग कराई जा रही है।
शहर की मलिन बस्ती वीरभट्टी के अलावा बाकरगंज, किला, सिंधू नगर, रामवाटिका, सूफी टोला, सैलानी, शहामतगंज, माडल टाउन, कोहड़ापीर, डेलापीर और नकटिया इलाकों में तो मच्छरों ने आतंक मचा रखा है। इससे लोगों में बीमारियां फैल रही हैं। लेकिन निगम को इसकी कोई परवाह नहीं है।
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मच्छर मारने की दवाओं का सालाना होता है छह करोड़ का निजी कारोबार
- शहर में मच्छर काटने की दवाओं का सालाना कारोबार करीब छह से सात करोड़ है। मगर इतने से भी मच्छरों को मारा नहीं जा सका है। इसमें सभी ब्रांड की क्वायल और लिक्विड दोनों शामिल हैं। दवाओं की सबसे ज्यादा बिक्री फरवरी-मार्च और अक्तूबर-नवंबर में होती है। फरवरी मार्च में ऐसा भी हो जाता है कि मच्छर मारने के प्रोडक्ट की बाजार में कमी पड़ जाती है। शहामतगंज के होलसेल विक्रेता अशोक बाबू ने बताया कि बाजार में क्वायल और लिक्विड उपलब्ध हैं। हर साल इन उत्पादों का छह से सात करोड़ रुपये का सालाना कारोबार होता है। डिस्ट्रीब्यूटर भानु का कहना है कि मच्छरों के आतंक ने ऐसे उत्पादों के कारोबार को हर साल बढ़ा रहे हैं।
-फागिंग का मच्छरों पर कम असर हो रहा है। इसके अलावा हम कर भी क्या सकते हैं। फागिंग करा रहे हैं। एंटी लार्वा का छिड़काव सितंबर में ही करा दिया था- डा. मातादीन, नगर स्वास्थ्य अधिकारी
-हमारे यहां तो कोई फागिंग करने आया ही नहीं, मच्छरों का तो पूरे इलाके में आतंक है। शालिनी सक्सेना, पार्षद वार्ड -47
-बुधवार की शाम को ही हमारे वार्ड में मशीन आई है, मैं खुद अपने वार्ड की गली-गली में फागिंग करा रहा हूं। गुरुवार से देखेंगे। मच्छर कम नहीं होंगे तो फिर से फागिंग कराने की कोशिश की जाएगी। नया वार्ड की कुछ और भी लोगों की समस्याएं हैं, उनका भी धीरे-धीरे समाधान हो जाएगा- विकाश शर्मा-पार्षद वार्ड-19
मच्छर से बचने के लिए विशेषज्ञ की राय
- डॉ. आशुतोष वर्मा ने बताया कि फॉगिंग से फौरी तौर पर मच्छर हवा में उड़ रहे मच्छर मर जाते हैं। लेकिन गंदे पानी में पनप रहा लार्वा नहीं मरता है। मच्छर सबसे ज्यादा कूलर के पानी में जमा होते हैं। कूड़े का ढेर, सीवर लाइन और जहां भी गंदा पानी जमा है वहीं भी मच्छरों की भरमार होती है। फॉगिंग होने से अस्थायी तौर पर मच्छर मर जाते हैं, लेकिन फॉगिंग का नालियों तथा गंदे पानी में पनप रहे लार्वा और मच्छरों के अंडों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
मलेरिया
एनाफिलीज मच्छर के काटने से होता है तेज बुखार। तेज बुखार के साथ ठंड लगती है। हालत बिगड़ने पर बेहोशी आती है।
बायरल
बुखार, गले में खरास, बदन दर्द होता है। तुंरत डाक्टरों की सलाह लें
मच्छरों से बचने के क्या करें उपाय
घरों के पास पानी जमा न होने दें। अगर जमा पानी हो तो उसमें कैरोसिन का छिडकाव करें। मच्छरदानी का प्रयोग अवश्य करें। सोते समय हाथ पैरों पर सरसों के तेल अवश्य लगाएं। शरीर को पूरी तरह ढ़क कर रखें।
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