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अंदर-अंदर चुनाव का जोश, मगर मतदाता खामोश

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बरेली। लोकसभा चुनाव के लिए आज मतदान होगा। मतदाता पूरी तैयारी से हैं और प्रत्याशियों की सांसें ऊपर-नीचे हो रही हैं। चुनावी रैलियों में भीड़ जुटती है, मतदाता प्रत्याशी की बात सुनते हैं और अपने घर चले जाते हैं। अब नेता के जाने के बाद न तो चौपाल लगती है और न ही मतदाता कहीं चुनाव पर बात करते नजर आते हैं। इसके चलते ही कोई भी चुनाव का रुझान भी नहीं भांप पा रहा है। मतदाता अपने मान में ठाने बैठे हैं, किसे वोट देना है लेकिन किसी को अपने मन की बात का अंदाजा नहीं लगने दे रहे हैं। कोई बोलने से बचने का कारण सामाजिक बुराई बता रहा है तो कोई कह रहा है कि अब चुनावी ट्रेंड बदल गया है।
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अब तो हर घर में नेता, कैसे खोलें भेद
जाटवपुरा में कृष्णा मंदिर के पास बैठे कुछ लोगों से बात की तो कालीचरन ने कहा कि चुनाव ने जाति-धर्म में बांट दिया है, कौन अपने मन की बात किससे करे। अगर कोई कुछ कहता है और दूसरा सहमत नहीं तो बुराई-भलाई की स्थिति बन जाती है। नवीन बोले- सबका तय है, कहां वोट करना है, बोलकर बुराई क्यों लें? नरेश बोले- जब अपने मन की करनी है, किसी के कहने से वोट डालना नहीं है तो बोलने का क्या फायदा? संजू ने कहा बोलकर बुराई होती है, वैसे ही चुनाव के मुद्दे बदल चुके हैं इसलिए चुप रहना ही अच्छा है। हरिओम ने कहा- समाज में अब खुलकर नहीं बोल सकते। कोई किसी की बात से आसानी से सहमत नहीं होता तो लोग बात भी नहीं करते। सुशील बोले- अब प्रचार कम हुआ है तो न नेता लोगों के बीच ज्यादा देर बैठते हैं और न ही लोग इस पर बात करते हैं। नेता पब्लिक के मुद्दों पर चुनाव ही नहीं लड़ते तो जनता क्या बात करे। नवरत्न सागर का कहना है कि नेता से हर आदमी का काम पड़ता है। लोग समझदार हो गए हैं। अगर बोलकर बुराई ले लेंगे तो काम में दिक्कत होगी। सचिन बोले कि आदमी बुराई से डरता है। हर पार्टी के नेता तो मोहल्ले में बैठे हैं। सबसे ज्यादा डर उनका है। कृपाशंकर ने कहा कि बोलने पर भी कोई मानने को तैयार नहीं कि मुझे वोट दिया तो क्या फायदा बोलने का, इसलिए चुप ही भली है।

जब मुद्दे जनता के नहीं तो बात किस पर हो
सैलानी में बर्फ की दुकान पर जमे लोगों में राजनीति की बात छेड़ी गई तो लोग बोले चुनाव में अब वो मुद्दे ही नहीं जिन पर लोग बात करें। आकिल ने कहा अब तो जाति-धर्म पर राजनीति होती है, जनता और विकास की बात कौन करता है इसलिए लोग चुप ही रहते हैं। आसिम बोले- पहले बड़े-बुजुर्ग खाली समय में बैठकर राजनीति पर बात करते थे। वोट देने को लेकर राय-मशविरा करते थे लेकिन अब बुराई के डर से बच्चे उन्हें नहीं बोलने देते। फिर चुनाव प्रचार भी तो अब ऑनलाइन हो गया है। मुताहिर ने कहा- वक्त बदल गया है। अब चुनाव के बारे में बात न करने में ज्यादा समझदारी है, कोई अपनी मंशा नहीं जताना चाहता। शहजाद बोले- चुनाव पर चर्चा को अब तो पार्टी ने प्रवक्ता छोड़ रखे हैं, जनता क्या बोले? आमिर के मुताबिक बेरोजगारी प्रमुख समस्या है लेकिन 2019 के चुनाव इस पर बात ही नहीं होती। युवा वर्ग इससे निराश है, अब तो सिर्फ वोट करेंगे। मोहम्मद ताहिर ने कहा-जिन मुद्दों पर चुनाव चल रहा है, उन पर बात से बुराई होती है इसलिए लोग बचते हैं। मो. अंजुम और शोएब का कहना था कि अब लोग वोट करते हैं, बोलने से मनमुटाव होता है इसलिए बचते हैं। तारिक ने कहा अब दौर बदल गया है, लोग बोलने से ज्यादा चुपचाप मतदान करने में ज्यादा समझदारी मानते हैं। मुस्तफा बोले- चुनाव पर बात करो तो पार्टी का ठप्पा लगता है। इससे लोगों में मनमुटाव और बुराई होती है इसलिए बचना जरूरी है।
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