फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पुराना शहर: आबादी चार लाख पर डिग्री कॉलेज एक भी नहीं

विज्ञापन
विज्ञापन
बरेली। गुजरे दौर में कई सरकारें आईं और गईं, मुसलमानों की रहनुमाई के बहुत सारे दावे हुए लेकिन मुस्लिम बहुल पुराना शहर एक डिग्री कॉलेज के लिए तरसता रह गया है। पिछले दो दशकों में शिक्षा के नाम पर सरकारों से जो कुछ भी मिला, सिर्फ नए शहर को मिला। यहां तक कि गांवों तक में डिग्री कॉलेज खुल गए लेकिन चार लाख से ज्यादा आबादी वाले पुराने शहर की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया।
विज्ञापन

इसे विडंबना ही मानिए कि शहर को रुहेलखंड विश्वविद्यालय की सौगात दिलाने वाले प्रो. कृपानंदन भी पुराना शहर के बालजती इलाके के थे, लेकिन उनका अपना इलाका उच्च शिक्षण संस्थान से महरूम रह गया। पुराना शहर के लोगों में इसकी कसक भी है। घेर जाफर खां में रहने वाले डॉ. एसयू चिश्ती कहते हैं कि पुराना शहर की इस जरूरत की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। सरकारें तो बेपरवाह रही हीं, आम लोगों की ओर से भी कोई जोरदार आवाज नहीं उठी। तालीम को हमेशा सबसे पीछे रखा गया। पुराना शहर में ऐसे भी लोगों की कोई कमी नही है जो बगैर सरकारी मदद के डिग्री कॉलेज खोल सकते हैं, लेकिन उनका ध्यान भी कॉलेज खोलने से ज्यादा शादी हाल खोलने पर रहा । पुराना शहर में शादी हाल हर तरफ मिल जाएंगे, इंटर कॉलेज इक्का-दुक्का ही हैं और डिग्री कॉलेज तो है ही नहीं।
नवादा शेखान में रहने वाले आजाद इंटर कॉलेज के रिटायर्ड शिक्षक अजीजउददीन सिद्दीकी कहते हैं कि पुराना शहर में सबसे ज्यादा कांग्रेस के जनप्रतिनिधि सत्ता में रहे लेकिन उन्होंने कभी यहां एक डिग्री कॉलेज खुलवाने की ओर ध्यान नहीं दिया। मुसलमानों की एक बड़ी आबादी यहां रहती है, लेकिन उनके रहनुमाओं ने कभी नहीं सोचा कि इस कौम को उच्च शिक्षा की जरूरत है तभी वह मुल्क की खिदमत कर पाएगी। यह बदकिस्मती है कि देश में एक तरफ बुलेट ट्रेन चलाई जा रही है, दूसरी तरफ पुराना शहर में शिक्षा की बुनियादी सहूलियत भी नहीं है।
विज्ञापन

सैलानी पर क्लीनिक चलाने वाले डॉ. रईस बेग का कहना है ऐसा नहीं है कि उन्होंने डिग्री कॉलेज खोलने के बारे में नहीं सोचा, लेकिन संसाधनों की कमी आड़े आ गई। जिन लोगों के पास संसाधन थे, उन्होंने इस बारे में सोचा ही नहीं। उनके पास जितने संसाधन थे, वह उनका इस्तेमाल कर जोगी नवादा में पब्लिक स्कूल चला रहे हैं। चक महमूद के शिक्षक तौकीर हसन खां कहते हैं शिक्षा की तरफ यहां के रहने वालों का ही रुझान नहीं रहा। सब पैसा कमाने में लगे रहे। पुराना शहर के मुसलमानों ने भी उच्च शिक्षा की जरूरत महसूस नहीं की । हाईस्कूल और इंटर पास करके काम धंधाें मे लग गए। जनप्रतिनिधियों पर दबाव बनाया जाता तो डिग्री कॉलेज खुल सकता था।
रोहली टोला के अधिवक्ता नईम आदिल खां कहते हैं कि हर बात में हम लोग सरकार की तरफ मुंह ताकते हैं। आज जब हर तरफ प्राइवेट कॉलेज खुल रहे हैं तो पुराना शहर मेें क्याें नहीं खुल सकता, लेकिन एजुकेशन की अहमियत यहां के बाशिंदे अब तक नहीं समझ पाए हैं। वरना अपने आलीशान मकान और शादी हाल बनवाने के बजाय स्कूल और कॉलेज भी खोलते।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें