बरेली। आजादी के बाद पूरे देश में कांग्रेस का बोलबाला था। 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में बरेली सीट पर कांग्रेस और जनसंघ के बीच सीधा मुकाबला हुआ था। अखिल भारतीय जनसंघ ने रोशनलाल खंडेलवाल को अपना प्रत्याशी घोषित किया था। कांग्रेस के सतीश चंद्र उनके मुकाबले चुनाव लड़ रहे थे। कांटे के इस मुकाबले में कुछ हजार वोटों के अंतर से रोशनलाल हार तो गए मगर उस चुनाव में अपनी सादगी से उन्होंने जनता का दिल जीत लिया था।
सुभाष पटेल बताते हैं कि आलमगिरीगंज के रहने वाले रोशनलाल खंडेलवाल की शुमारी बरेली में अखिल भारतीय जनसंघ की नीव रखने वाले नेताओं में होती थी। वह 22 गांवों के जमींदार थे। बरेली-मुरादाबाद मंडल में उनकी बैंकें भी चलती थीं। 1952 के चुनाव में जब जनसंघ ने उन्हें बरेली से टिकट दिया तो वह पूरी ताकत से मैदान में उतरे। पंडित जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व से प्रभावित मतदाताओं के बीच जनसंघ की नीतियों को पहुंचाना कठिन काम था, लेकिन रोशनलाल ने इसके लिए जीतोड़ कोशिश की। सुभाष पटेल बताते हैं कि वह तो उस समय बमुश्किल 8-10 साल के ही थे, लेकिन बाबू जी (उनके पिता बृजमोहनलाल) के साथ पार्टी के प्रचार के लिए अक्सर चले जाते थे। उन्हें अच्छी तरह याद है कि तब चुनाव प्रचार करना कितना मुश्किल था। आरामदायक गाड़ियां तो थी ही नहीं, जीपें भी महंगी पड़ती थीं। जनसंघ कार्यकर्ता लहडू (बैलगाड़ी) और साइकिलों से गांव-गांव जाकर प्रचार करते थे। बड़े नेता लोगों को लुभाने के लिए हाथी और घोड़े से भी गांव पहुंचते थे तो बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गोँ का हुजूम लग जाता था। लोग नेताओं की बातें गौर से सुनते थे। कभी-कभी वह राधेश्याम रामायण की चौपाइयां भी सुनाते थे तो मतदाता प्रभावित हुए बिना नहीं रहते थे।
हर गुरुवार को लगती थी मंडली
रोशनलाल खंडेलवाल की पौत्र वधू अनुराधा खंडेलवाल बताती हैं कि दादा जी (ददिया ससुर) हारमोनियम बहुत अच्छा बजाते थे। राधेश्याम कथावाचक की उनके घर हर बृहस्पतिवार को मंडली सजती थी। उसमें राधेश्याम रामायण गाई जाती थी तो बाकी लोग गाते थे और दादा जी (रोशनलाल खंडेवाल) हारमोनियम बजाते थे। उनका परिवार शुरू से ही धार्मिक रहा है।