बरेली। दोनों लोकसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की आबादी ठीक ठाक है, लेकिन इस बार अगर भाजपा को छोड़ भी दें तो भी धर्म निरपेक्ष कहे जाने वाले राजनीतिक दलों बसपा, सपा और कांग्रेस से कोई मुस्लिम प्रत्याशी पूरे बरेली मंडल से नहीं था। इसलिए मुस्लिम मतदाता मतदान से पहले तक किसी भी दल या प्रत्याशी को चुनाव लड़ाने के प्रति उदासीन रहे। मगर, मोदी को हराना उनकी प्राथमिकता में था, इसलिए जब मतदान का दिन आया तो विकल्प के रूप में सपा-बसपा गठबंधन के पक्ष में वोट डालने निकल पड़े। हालांकि इसके चलते हिंदू मतदाताओं ने भी भाजपा के पक्ष में पूरा जोर लगा दिया।
पिछले कम से कम तीन दशक की बात करें तो प्रत्येक लोकसभा चुनाव में रुहेलखंड खासतौर से बरेली लोकसभा सीट पर किसी न किसी राजनीतिक दल ने एक मुस्लिम प्रत्याशी जरूर लड़ाया। 1982, 1984 के अलावा 1989 में कांग्रेस ने आबिदा बेगम को उतारा। फिर अहमद अकबर डंपी और उसके बाद इस्लाम साबिर किसी न किसी दल से लोकसभा चुनाव लड़कर मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करते रहे। यहां तक कि 2014 की मोदी लहर में भी इस्लाम साबिर के बेटे शहजिल इस्लाम की पत्नी आयशा इस्लाम ने लोकसभा का चुनाव सपा से लड़ा था। मुस्लिम प्रत्याशी लड़ने की स्थिति में यह कहा जाता था कि इससे हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में हो जाता है और भाजपा इसका फायदा उठाकर सीट जाती है।
2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन ने भले ही हिंदुओं में कुर्मी बिरादरी से भगवतसरन गंगवार को टिकट देकर इस बार मुस्लिम प्रत्याशी के जरिए भाजपा को फायदा मिलने के ठप्पे से बचने की कोशिश की। मगर, भगवतसरन गंगवार को टिकट मिलने के बाद उनके पक्ष में जिस तरह मुस्लिम, दलित और यादव लामबंद होने लगे, उसको देखते हुए हिंदुओं की अन्य जातियां राष्ट्रवाद, पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक, देश की सुरक्षा और हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा के पक्ष में एकजुट हो गईं। सपा-बसपा गठबंधन, कांग्रेस और भाजपा तीनोें दलों से हिंदू प्रत्याशी होने के बाद भी मतदान के दिनमुस्लिमों का ध्रुवीकरण जहां सपा-बसपा गठबंधन के पक्ष में था, वहीं हिंदुओं में सवर्ण, पिछड़ी (यादव छोड़कर) और गैर जाटव दलितों ने भाजपा के पक्ष में वोटिंग की। मतलब, मुस्लिम प्रत्याशी न होने के बाद भी मुस्लिमों का ध्रुवीकरण गठबंधन के पक्ष में केवल इसीलिए हो पाया कि उनके सामने किसी भी तरह मोदी को सत्ता में आने से रोकने का विकल्प केवल माया-अखिलेश ही नजर आए। ज्यादातर बूथों पर मुस्लिम मतदाता वोट देने जरूर निकल रहे थे, लेकिन अपने बीच का प्रत्याशी न पाकर वह बहुत ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहे थे। मुस्लिम बहुल बूथों पर वोटिंग प्रतिशत दोपहर तीन बजे के बाद ही बढ़ा। दोपहर में अधिकांश मुस्लिम बूथ खाली थे। सुबह हिंदू और मुस्लिम दोनों वर्गों के मतदाता अपने-अपने पसंदीदा दलों के पक्ष में वोट देने के लिए पूरी तरह लामबंद रहे। मुस्लिम जहां भाजपा को हराने में जुटे थे, वहीं हिंदुओं में सवर्ण, गैर यादव पिछड़े और गैर जाटव दलित यह सोचकर पोलिंग बूथ की तरफ भाग रहे थे कि किसी भी तरह मोदी कमजोर न रह जाएं।