बरेली। बहुत अच्छा तो कोई नहीं है, लेकिन जब वोट देंगे तो यह सोचकर देंगे कि कम बुरा कौन है। सिविल लाइंस की ओल्ड आरटीओ कॉलोनी में ‘गृहमंत्री’ का फरमान यही है। महिलाओं के बीच लोकसभा चुनाव पर चर्चा छिड़ी तो अंतत: सरकारों की वादाखिलाफी सबसे मुख्य मुद्दा बनकर उभरी। मिसाल फीस अध्यादेश की दी गई। गुस्सा इस बात पर दिखा कि फीस कम तो नहीं हुई, उल्टे अध्यादेश लागू होने के बाद इस बार स्कूलों ने अपनी फीस 20 से 50 फीसदी तक बढ़ा दी है। महिलाओं ने सवाल किया कि आम आदमी आखिर कैसे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाए।
अनीता खंडेलवाल का कहना था कि महिलाओं को सुरक्षा दिलाने का हर सरकार ने वादा किया लेकिन किसी ने इसे गंभीरता से निभाने की कोशिश नहीं की। महिलाएं घर और बाहर दोनों जगह असुरक्षा के अहसास से ग्रस्त हैं। घरेलू हिंसा भी कम नहीं हो रही हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराध बढ़ने की बात का तो सभी ने समर्थन किया, लेकिन घरेलू हिंसा के मुद्दे पर सहमति नहीं बनी। रूपाली का कहना था कि घरेलू हिंसा के मामले आपस में बेहतर समझ न होने की भी वजह हैं। ससुराल वाले अगर बहू को बेटी और बहुएं ससुराल को अपना परिवार समझें तो यह दिक्कत न के बराबर हो सकती है। बातचीत में कई और मुद्दे उछले लेकिन जब मोनिका ने फीस अध्यादेश और स्कूलों की मनमानी का मुद्दा उठाया तो फिर चर्चा इसी मुद्दे पर टिककर रह गई। कमलेश झा ने कहा कि स्कूलों से ज्यादा भ्रष्टाचार कहीं नहीं है। सरकारों की अनदेखी ने स्कूलों को दुकानों में तब्दील कर दिया है। स्कूलों का भ्रष्ट रवैया आने वाली पीढ़ी को भी भ्रष्ट बना रहा है। लंबी चर्चा के बीच कई महिलाओं ने यहां तक कह दिया कि वे तो फीस अध्यादेश का पालन कराने वाली सरकार को ही वोट देंगी। निधि शर्मा ने महिला आरक्षण का मुद्दा उठाया। कहा जब तक राजनीति में महिलाओं की भागेदारी सुनिश्चित नहीं होगी तब तक उनकी सुरक्षा और उत्पीड़न के मसले भी हल नहीं होंगे।