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राशन ठिकाने लगाना था इसलिए एजेंसियों को उठाने ही नहीं दिया

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बरेली। रिठौरा जैसे राशन घोटालों को अंजाम देने के लिए खाद्य और पूर्ति विभाग के अफसरों ने ही अपने सिस्टम में कई सुराख छोड़ दिए। अब रिठौरा मामले में छोटे-मोटे कर्मचारियों की गर्दनें नापकर भले ही इस मामले पर लीपापोती की तैयारी की जा रही हो, लेकिन सिस्टम का झोल इस बात की गारंटी है कि इस तरह के घोटाले भविष्य में भी होते रहेंगे। दरअसल, सरकारी गोदामों से कोटेदारों के राशन का उठान करने के बाद उसकी कालाबाजारी न हो, इसके लिए शासन के निर्देश पर डोर-टू-डोर डिलीवरी की व्यवस्था लागू होनी थी। इसके लिए आउटसोर्सिंग एजेंसी को ठेका दिया जाना था मगर राशन की कालाबाजारी का रास्ता खुला छोड़ते हुए अफसरों ने इसके टेंडर कराने में ही कोई दिलचस्पी नहीं ली।
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रिठौरा में सरकारी राशन घोटाले में राशन के उठान से लेकर वितरण तक के बीच कई बड़ी खामियां उजागर हो चुकी है। इस सिस्टम में सबसे बड़ा छेद यह सामने आया है कि सरकारी गोदाम से कोटेदार जिस राशन का उठान करते हैं, उसमें इसकी कोई गारंटी नहीं होती है कि वह राशन उसकी दुकान तक पहुंचेगा ही। इसके लिए शासन की ओर से बनाया गया त्रिस्तरीय चेकिंग सिस्टम भी ध्वस्त पड़ा हुआ है। कोटे की दुकान पर उतरने वाले राशन का सत्यापन ग्राम पंचायत का सेक्रेटरी या लेखपाल नहीं कर रहा है। इसका भी खुलासा रिठौरा प्रकरण से ही हुआ है। हालांकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में यह गड़बड़ी कोई नई नहीं है। इसके अलावा सरकारी गोदामों से उठने वाले अनाज की कालाबाजारी रोकने के लिए डोर-टू-डोर डिलीवरी सिस्टम भी लागू किया जाना था। इसके तहत गोदाम से कोटे की दुकान तक अनाज पहुंचाने का काम शासन से नियुक्त एजेंसी को करना था। इसी एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपी जानी थी कि वह सभी नियमों का अनुपालन कराए। सूत्र बताते हैं कि इसके लिए टेंडर कराने के आदेश कई बार जारी भी हुए लेकिन पूर्ति विभाग और एसएफसी के अफसरों ने इसे लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई। हालांकि तर्क यह दिया जा रहा है कि कोई एजेंसी इस काम को लेने के लिए तैयार ही नहीं है।

राशन ले जाने वाली गाड़ियों में नहीं लगाए जीपीएस
डोर टू डोर सिस्टम के अलावा सरकारी अनाज ले जाने वाले वाहन की ऑनलाइन निगरानी के लिए शासन ने उनमें जीपीएस सिस्टम भी लगाने का आदेश दिया था। जीपीएस के जरिये ही निगरानी होनी थी कि सरकारी गोदामों से राशन लेकर गईं गाड़ियां कोटे की दुकानों तक पहुंची भी या नहीं। खाद्य और पूर्ति विभाग के अफसरों ने इसे भी लागू नहीं होने दिया। ऐसे लचर व्यवस्था का सीधा फायदा माफिया और घोटालेबाजों को मिल रहा है।
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संदिग्ध अफसरों को अब तक नोटिस भी नहीं
रिठौरा राशन घोटाले में सबसे ज्यादा दिलचस्प यह है कि कई छोटे-मोटे कर्मचारियों को तो नाप दिया गया लेकिन जिन अफसरों ने 35 लाख पर मामला लॉक कर उसे रफादफा करने में अहम भूमिका निभाई, उन पर शिकंजा कसने में अभी भी रहमदिली दिखाई जा रही है। इन अफसरों को अब तक नोटिस देने की औपचारिक कार्रवाई तक नहीं हुई है। यानी इससे यह भी साफ हो रहा है कि शासन तक मामला पहुंचने के बावजूद इन अधिकारियों को अंदरखाने बचाने का रास्ता अभी बचाए रखा गया है जबकि यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि बड़े अफसरों की शह के बिना इतने बड़े घोटाले पर पर्दा डालना मुमकिन नहीं था।

रकम डकारने वालों का हाजमा खराब
रिठौरा राशन घोटाले में फंसे राशन माफिया को बचाने के लिए कई अफसरों और सफेदपोशों ने मोटी रकम डकारी थी। सूत्र बताते हैं कि राशन माफिया को पूरी गारंटी दी गई थी कि उस पर आंच नहीं आने दी जाएगी। यही वजह थी कि 27 नवंबर को यह घोटाला सामने आने के बावजूद ऊपरी दबाव के कारण पुलिस की ही पहली कार्रवाई में करीब दस दिन लग गए। इसमें निचले स्तर तक कर्मचारियों पर कार्रवाई तो हो गई लेकिन इस घोटाले को लेकर जिन दो बड़े अफसरों के नाम सामने आ रहे हैं, उन्हें तो अब तक नोटिस तक जारी नहीं हुआ है। हालांकि यह घोटाले की एक के बाद एक परतें खुलने से आरोपियों को बचाने के लिए रकम हजम करने वालों का हाजमा खराब हो रहा है।

पीडीएस के राशन की त्रिस्तरीय चेकिंग व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा होगी। इसके अलावा कोटेदारों की भी जल्द ही मीटिंग बुलाई गई है। रिठौरा मामले जैसी गड़बड़ी न होने पाए, इस पर खास फोकस रहेगा। - राजन गोयल, खाद्य उपायुक्त
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