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माननीयों की बातें.. दावे विकास के और पांच करोड़ लौटने को

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बरेली। लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लगने की अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं। ग्राम्य विकास अभिकरण (डीआरडीए) ने बरेली और आंवला सांसदों की निधि में 2.5-2.5 करोड़ रुपये लेने के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा था। उस प्रस्ताव पर अब तक सांसद निधि में पांच करोड़ रुपये नहीं आए हैं। अगर मार्च के पहले हफ्ते में आचार संहिता लग गई तो पांच करोड़ रुपये के अलावा पांच करोड़ की आधी किस्त वर्तमान सांसद खर्च नहीं कर सकेंगे। दोनों लोकसभा सीटों पर दस करोड़ रुपये लोकसभा चुनाव के बाद नव निर्वाचित सांसद ही खर्च कर सकेगा।
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प्रत्येक सांसद को अपने लोकसभा क्षेत्र में सड़क, नाली, बिजली घर निर्माण, सोलर लाइट आदि कामों के लिए हर साल पांच करोड़ रुपये मिलते हैं। यह अलग बात है कि ज्यादातर माननीय अपनी सांसद निधि से जन उपयोगी कामों की खानापूरी के नाम पर कार्यदायी संस्थाओं पर दबाव बनाकर अपने चहेतों या चेलों को ठेके दिलाकर उसे कमाई का जरिया बना लेते हैं। बरेली की दोनों लोकसभा सीटों का हाल भी अलग नहीं है। बीते पांच साल के कार्यकाल में सांसद निधि से कौन से काम हुए, जिससे जनता को सहूलियत हुई। यह आंकड़े गिनाने के लिए आरईडी (पहले इसे आरईएस कहते थे) की फाइलें तो पूरी बनी हुई हैं, लेकिन इनके कामों का सत्यापन अगर मौके पर जाकर किया जाए तो 80 फीसदी से ज्यादा काम या तो अधूरे मिलेंगे या फिर गायब होंगे। सांसद निधि के कामों की लेटलतीफी पर पांच साल तक कभी नोटबंदी तो कभी ई टेंडरिंग या जीएसटी की आड़ लेकर अफसर बचते रहे।
माननीयों ने भी अपनी सांसद निधि के काम जल्दी कराने का दबाव नहीं बनाया। इसलिए सांसद निधि छह महीने से डेढ़ साल तक लेट खर्च हुई। काम भी मनमाने तरीके से कराए गए। न उनकी गुणवत्ता जांची गई, न ही यह देखा गया कि काम हुए भी हैं या नहीं। वर्ष 2013-14 से ही सांसद निधि देरी से खर्च करने से आखिरी साल यानी वित्तीय वर्ष 2018-19 में सांसद निधि की अब तक एक भी किस्त नहीं आई है क्योंकि पुराने कामों का उपभोग प्रमाण पत्र समय से नहीं भेजा गया। अब सांसद निधि के काम आनन-फानन में पूरा दिखाने की कोशिश चल रही है। माननीय अपनी पांच साल की सांसद निधि में 25 करोड़ के खर्च का हिसाब क्षेत्र की जनता को देने को तैयार नहीं हैं क्योंकि वह जानते हैं कि उनके गोद लिए गांव ही बदहाल हैं। बाकी गांवों का क्या हाल होगा।
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