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बच्ची का पैर सड़ रहा था तो डॉक्टर क्या कर रहे थे!

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बरेली।
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इलाज में लापरवाही की सजा भुगत रही राजीव कुमार और दुर्गेश की बच्ची के मामले में सोमवार को सीएमओ कार्यालय में डॉक्टराें के पैनल ने दोनों पक्षाें से तीन घंटे तक पूछताछ की। इस दौरान मां दुर्गेश ने कहा कि उसे अपनी बेटी के पैर के बदले पैर चाहिए, क्या डॉक्टर उसे लौटा सकते हैं। पैनल के डॉक्टराें ने उसे ढांढस बंधाया। वहीं अपना पक्ष रखने आए डॉ. रवि खन्ना ने भी अपनी बात रखी। पैनल के कई प्रश्न ऐसे रहे कि डॉक्टर कोई जवाब ही नहीं दे सके। पैनल ने पूछा कि इस मामले में सिर्फ एक बात जो साफ नजर आ रही है कि पैर में सेप्टिक होने का कारण जो भी हो लेकिन जब यह शुरूआती दौर में था तो इसका इलाज क्याें नहीं हुआ और मां बाप को बताया क्यों नहीं गया?
बच्ची को न्याय दिलाने के लिए डीएम पिंकी जोवल के निर्देश पर सीएमओ डॉ. विजय यादव ने तीन सदस्यीय पैनल का गठन किया है। इसमें बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. करमेंद्र, एसीएमओ डॉ. अशोक कुमार और डॉ. एसएस चौहान शामिल हैं। पैनल के अध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार हैं। दोपहर दो बजे शुरू हुई बैठक में सबसे पहले बच्ची के माता- पिता और उनके परिवार के अन्य सदस्यों को अपनी बात रखने का मौका दिया गया। उन्होंने पैनल को बताया कि पांच दिन तक जब बच्ची डॉ. रवि खन्ना के यहां भर्ती थी तो उसे देखने के लिए जूनियर डॉक्टरों को लगा दिया और डॉ. खन्ना खुद बाहर चले गए। जब बाहर ही जाना था तो बताकर जाते, इस बीच वेंटीलेटर कक्ष में जाने नहीं दिया और लापरवाही करते रहे। बच्ची का पैर कब काला पड़ गया पता ही नहीं चला। अगर डॉक्टर इलाज करते तो बता सकते थे कि पैर काला पड़ रहा है, इलाज नहीं था तो ले जाने को कहते। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। सिर्फ हर दोपहर में 2 बजे 15 हजार रुपये जमा कराते रहे। पैनल ने पूछा आपको कैसे पता कि डॉक्टर नहीं थे, तो परिजनों ने बताया कि डॉक्टर एक भी दिन बच्ची को देखने नहीं आए। इसके सबूत भी हैं। वहीं डॉक्टर रवि खन्ना ने अपनी बात को साबित करने की कोशिश की। उनकी बात को भी दर्ज कर लिया गया है। पैनल के डॉक्टरों ने बताया कि मामले पर अभी विशेषज्ञों से चर्चा होगी, इसके बाद सीएमओ के सामने भी इसे रखा जाएगा। इसके बाद रिपोर्ट डीएम को दी जाएगी।
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हम एक आर्टरी में कैसे खून का थक्का डाल सकते हैं। वहां तो खून दिल से आता है। थक्का जहरवाद की वजह से खून में बनता है और खून में बहते- बहते कहीं भी अटक जाता है। जहां रास्ता ब्लॉक होता है उस हिस्से की सप्लाई खत्म हो जाती है वो शरीर का अंग धीरे- धीरे खराब होने लगता है। इसे सेप्टीसीमिया इंड्यूस्ड सेप्टिक थ्रोमबोसिस कहते हैं। नवजात में ज्यादा होता है।
-डॉ. रवि खन्ना
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