बरेली। लॉकडाउन शुरू होने के बाद पिछले एक-डेढ़ महीने में जिले भर में सरकारी राशन पकड़े जाने की सिलसिलेवार घटनाओं ने साफ किया है कि सरकार जो राशन गरीबों को मुफ्त बांटने के लिए दे रही है, वह गरीबों की झोली के बजाय राशन माफिया के गोदामों में पहुंच रहा है। फिर भी सरकारी सिस्टम ने इन मामलों पर लीपापोती करने के सिवा कुछ नहीं किया। आंवला का ऐसा ही एक मामला मिसाल बन गया, जिसमें पूर्ति विभाग और मंडी परिषद दोनों विभागों ने सबकुछ सामने होने के बावजूद कार्रवाई से हाथ खींच लिए।
लॉकडाउन से बेरोजगारी और भुखमरी के दिल दहला देने वाले दौर में रोज कमाने खाने वाले गरीबों पर रोजगार छिनने से चाहे जो गुजर रही हो लेकिन उनकी रोटी पर गिद्ध दृष्टि लगाए रखने वाले राशन माफिया की लॉटरी निकल आई है। गरीबों के लिए आवंटित मुफ्त राशन सीधे उनके गोदामों में पहुंच रहा है। जिन विभागों पर यह लूटखसोट रोकने की जिम्मेदारी है, वे गरीबों के इन दुर्दिनों में भी उनके बजाय राशन माफिया के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। प्रशासन के स्तर पर जिस कड़ी निगरानी की जरूरत है, वह भी नहीं दिखाई दे रही है।
कोई इतना तो पूछे.. पकड़े गए राशन का सैंपल क्यों नहीं लेते
इस सवाल का शायद ही कोई जवाब हो कि लॉकडाउन शुरू होने के बाद जिले भर कई जगह राशन पकड़े जाने के बावजूद उनके सैंपल क्यों नहीं लिए गए। मीरगंज, बहेड़ी और नवाबगंज के बाद आंवला में भी यही घटना दोहराई गई। हाल ही में यहां एक ट्राली चावल पकड़े जाने का मामला पुलिस तक पहुंचा तो पूूरा सिस्टम राशन माफिया को बचाने में जुट गया। मंडी के स्टाफ ने मामला रफादफा करने के लिए जांच तो की नहीं, सीधे 35,700 रुपये जुर्माने की रसीद काट दी। पूर्ति विभाग ने तो इस राशन का सैंपल भरने तक से हाथ खींच लिए। किसी तरह मामला डीएम तक पहुंचा तो दो दिन बाद कारोबारी के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत मुकदमा लिखा गया। हालांकि फिर भी यह सवाल दबा रह गया कि यह राशन कहां से आया था और इलाके के सप्लाई इंस्पेक्टर ने इस पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। मामूली सी छानबीन में सिर्फ इतना ही पता चल पाया कि सपा से जुड़े कारोबारी ने इस चावल को एक राइस मिल से खरीदना बताया था जबकि राइस मिल काफी समय से बंद पड़ी थी। नियमों के मुताबिक कारोबारी की आढ़त का लाइसेंस भी रद्द होना चाहिए था लेकिन इस मामले में मंडी का स्टाफ उस पर मेहरबान हो गया। ध्यान दिला दें कि जिले में पिछले सालों में भी कई बड़े राशन घोटाले हुए जिनमें नीचे से ऊपर तक कई सरकारी अधिकारियों की साफ तौर पर भूमिका संदिग्ध मिली लेकिन कुछ नेताओं की सरपरस्ती होने की वजह से वे साफ बच गए। सिस्टम, माफिया और नेताओं का यही गठजोड़ अब लॉकडाउन में भी गरीबों की रोटी छीन रहा है।
7.70 लाख क्विंटल चावल बंटना है जून तक.. माफिया सक्रिय
लॉकडाउन में जून तक करीब 5.54 क्विंटल चावल गरीबों को मुफ्त बांटा जाना है। इसके अलावा करीब सवा दो लाख क्विंटल चावल तीन रुपये किलो के रेट पर दिया जाना है। करीब 7.70 लाख क्विंटल चावल पर माफिया की नजर है। सरकारी निगरानी व्यवस्था चूंकि पहले से ठप है लिहाजा माफिया को रोक पाना भी मुमकिन नहीं है। कोटे से राशन न मिलने, कम राशन बांटने और ज्यादा पैसा वसूले जाने की तहसीलों और जिला मुख्यालय पर आने वाली शिकायतों और उनके निस्तारण के बीच बड़ा अंतर साफ तौर पर इसकी भविष्यवाणी भी कर रहा है।
चना भी कहीं सपना न रह जाए
15 मई से हर राशन कार्ड धारक को एक किलो देसी चना भी दिया जाना है। जिले में 22,577 क्विंटल चना मुफ्त बंटना है। इसकी सप्लाई दुकानों पर शुरू हो गई है। मध्यप्रदेश में उत्पादित उच्च गुणवत्ता का चना सरकारी संस्था नाफेड ने सप्लाई किया है। आशंका जताई जा रही है कि चने पर भी माफिया की नजर लग सकती है क्योंकि खुले बाजार में देसी चना 50-60 रुपये किलो है।
आंवला में पकड़ा चावल सरकारी है या नहीं, यह जांच आपूर्ति विभाग को करनी है। जब चावल पकड़ा गया तो सप्लाई इंस्पेक्टर भी मौजूद थे लेकिन वह पुष्टि नहीं कर पाए कि चावल सरकारी है या नहीं। कारोबारी के पास इस चावल का कोई कागज नही था, इसलिए जुर्माने और मंडी शुल्क की वसूूूली हमने की है। कारोबारी अगर आढ़ती है तो इस पर भी जांच कर अलग कार्रवाई से होगी। - शिव मंगल सिंह चंदेल, उपनिदेशक मंडी परिषद
कुछ शिकायतें मिली हैं। वितरण व्यवस्था पर निगरानी और सख्त करेंगे। 15 मई से मुफ्त चावल बांटा जाना है। सरकारी चावल बाजार और राशन माफिया तक न पहुंचे, इसके लिए कार्ययोजना बना रहे हैं। स्टाफ को अलर्ट कर दिया है। मंडी परिषद से भी सहयोग लेंगे। - सीमा त्रिपाठी, डीएसओ