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सियासत और अपराध: 24 साल बाद भी कातिल का पता नहीं, गवाहों को धमकाया; इंसाफ मांग रहे परिजन, जांच के नतीजे सिफर

Mon, 12 Oct 2026 05:18 AM IST
विनीत सक्सेना बहेड़ी (उत्तराखंड बार्डर) से रिपोर्ट

सार

लखनऊ राजभवन के पास 6 मार्च 2002 में सपा विधायक मंजूर अहमद की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है। विधायक मंजूर अहमद अपनी सादगी और जनता से सीधे जुड़ाव के लिए जाने जाते थे। बरेली तक उनके चाहने वालों का जनसैलाब उमड़ पड़ा था। हत्या के बाद लखनऊ से उनका शव बहेड़ी पहुंचा तो शहर की सड़कों पर पैर रखने तक की जगह नहीं थी। छतों पर भी भारी भीड़ जमा थी। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को परिवार से मिलवाने के लिए फोर्स को भारी मशक्कत करनी पड़ी थी।
 
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सपा विधायक मंजूर अहमद हत्याकांड - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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लखनऊ में राजभवन के सामने 24 साल पहले विधायकों के धरने के दौरान बहेड़ी से सपा विधायक मंजूर अहमद की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। परिवार को आज तक हत्या की वजह तो क्या, यह तक स्पष्ट नहीं हो पाया कि गोली सीने पर मारी गई थी या पीठ पर। परिवार का आरोप है कि पुलिस ने शुरू से ही लिखा-पढ़ी गलत कर दी। हमें जो सही लगा तब कहा और किया। बाद में इतना डराया गया कि परिवार वालों ने भी पैरवी करनी छोड़ दी। जांच सीबीआई को दी गई मगर विवेचक ने वहां भी गवाहों के बताए तथ्यों पर पड़ताल करके कातिलों का सुराग लगाने के बजाय गवाहों को ही धमकाना शुरू कर दिया। गवाहों से कहा गया कि विधायक के पीछे तुम थे तो पीठ पर गोली तुमने ही मारी होगी। तब से सहमे गवाहों और यहां तक कि विधायक के परिवार वालों ने भी कभी सीबीआई दफ्तर का रुख नहीं किया।

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मंजूर अहमद के परिवार की मानें तो उनको भी राजनीतिक पचड़ों में ऐसा उलझाया गया कि आज तीसरी पीढ़ी भी खोया वजूद नहीं पा सकी। विधायक मंजूर अहमद की पत्नी को टिकट मिला, मगर आरोप है कि उन्हें चुनाव हरवा दिया। तेजतर्रार बेटे अंजुम रशीद पार्टी में विरोध के चलते बसपा में चले गए। करीब 71 साल के हो चुके अंजुम दो बार चुनाव भी लड़े मगर जीत नहीं पाए। अब पोता आदिल रशीद चाहता है कि दादा मंजूर अहमद जैसी सियासी पहचान भले ही न मिले मगर हत्या की वजह और उनके कातिलों की पहचान तो बता दी जाए।

अमर उजाला ने 24 साल बाद फिर विधायक मंजूर अहमद के परिवार से बात की। हत्या के वक्त मार्च 2002 में बहेड़ी में एक गली के आखिर में बना उनका मकान अब आलीशान शोरूम से घिर चुका है। दुकानों की कीमतें करोड़ों में पहुंच चुकी हैं मगर विधायक का घर पहले जैसा ही दिखा। सामने बैठे बुजुर्ग बोले-हम ही हैं मंजूर अहमद के बेटे अंजुम रशीद। यही अंजुम कभी अपनी तेज-तर्रारी के लिए जाने जाते थे। बदरंग दीवारों वाले छोटे कमरे में बैठे अंजुम कहते हैं, मंजूर भाई हों या हम, राजनीति से कमाया नहीं, गंवाया है। 20 बीघा जमीन बिक गई। लोगों के लिए आज भी खड़े रहते हैं। हालांकि सिस्टम लोगों के वक्त के हिसाब से काम करता है। एक समय मंजूर अहमद की चिट्ठी पर कोई भी काम हो जाता था। अब तो उनके ही कातिलों की तलाश में हमें कोई मदद नहीं मिलती। हम सिस्टम से हार गए, इसलिए पैरवी ही बंद कर दी। अंजुम रशीद की तकलीफ है कि हत्या के वक्त मौजूद 146 में से एक भी विधायक ने कातिल की पहचान नहीं बताई। कोई यह बोलने को तैयार नहीं कि गोली सीने पर मारी गई या पीठ पर। मौके से गिरफ्तार आरोपी अभिषेक रिहाई के बाद से ही गायब है।
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विधायक मंजूर अहमद हत्याकांड
उत्तर प्रदेश में मार्च 2002 में राष्ट्रपत्ति शासन था और कार्यवाहक मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह थे। उसी दौरान छह मार्च 2002 को राजभवन के सामने सपा विधायकों के धरने के दौरान बहेड़ी के विधायक मंजूर अहमद की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

पुलिस ने जौनपुर के अभिषेक को घटनास्थल के पास से गिरफ्तार करने का दावा किया था। यह भी बताया था कि अभिषेक ने बाहुबली और चर्चित हस्ती बनने के लिए विधायक की हत्या की। परिवार को पुलिस की कहानी पर भरोसा नहीं था। लंबे विरोध के बाद सीबीआई जांच शुरू हुई। परिवार का आरोप है कि पुलिस ने शुरू से ही लिखापढ़ी ऐसी उलझाई की सीबीआई और कोर्ट से भी राहत नहीं मिल सकी। यही वजह रही कि आरोपी अभिषेक बरी हो गया। हत्या की असल वजह और कातिल का नाम आज तक सामने नहीं आ सका। विधायक मंजूर अहमद की हत्या के पीछे परिवार गहरी साजिश बताता है।

विधायक मंजूर अहमद के बेटे अंजुम ने यह भी बताया कि हत्या के बाद सबके होंठ सिल दिए गए थे। मुंह खोलने की मनाही थी। इसलिए तब खामोश रहे। हालांकि शक तो हमें भी शुरू से था। दरअसल, हत्या से चार दिन पहले ही घर वाले लैंडलाइन फोन पर कॉल आई थी। बेटी ने फोन रिसीव किया तो उधर से बोल रहे व्यक्ति ने बिना पहचान बताए कहा कि मंजूर भाई लखनऊ से लौटेंगे नहीं। बेटी ने यह बात बताई तो तुरंत लखनऊ कॉल करके साथियों से कहा कि विधायक जी को कमरे से बाहर निकलने मत देना। मगर, भागदौड़ काम नहीं आई। साजिश करने वाले अपना काम कर गए। हमने अपने स्तर से छानबीन की तो धीरे-धीरे पूरी साजिश समझ आ गई। इसी वजह से पार्टी से किनारे लगा दिए गए।

सीबीआई ने गवाहों से कहा-पीछे तुम थे तो तुमने ही मारी होगी गोली
पूर्व चेयरमैन अंजुम बताते हैं, 2007 तक लगातार पैरवी की। सीबीआई टीम ने जब गवाहों को राजभवन बुलाया तो उम्मीद जगी कि अब मामला सही से खुलेगा मगर हुआ इसके उलट। विवेचक ने जिलानी समेत बाकी गवाहों से पूछा कि जब गोली चली तो तुम कहां थे, गवाहों ने कहा कि विधायक जी के पीछे। विवेचक ने धमकाते हुए कहा, तब तो तुम लोगों ने ही गोली मारी होगी। गवाह समझ गए कि कातिलों का सुराग लगाने के बजाय उन्हें ही फंसाया जा रहा है। परिवार वाले भी उसके बाद कभी लखनऊ नहीं गए।

जांच पर सवाल उठाना उचित नहीं : आईपीएस पांडे
मंजूर हत्याकांड को नजदीक से समझने वाले और श्रीप्रकाश शुक्ला के एनकाउंटर से चर्चित पूर्व आईजी आईपीएस राजेश पांडे का कहना है-मामले की पड़ताल सीबीआई ने बारीकी से की। उस पर सवाल उठाना उचित नहीं है। हत्यारोपी अभिषेक तब बाहुबली की पहचान वाले चर्चित पूर्व सांसद धनंजय सिंह से प्रभावित था। बड़ी हस्ती की हत्या कर बाहुबली बनना चाहता था।

दिल्ली से कॉल की बात लखनऊ पहुंची
अंजुम रशीद बताते हैं कि हत्या के बाद से हालात ऐसे बदले कि परिवार ही निशाने पर आ गया। मां को टिकट देकर उनके खिलाफ करने की कोशिश की गई। घर की बातें लीक करवाने वाले भी लगाए गए। उसी दौरान इटावा से कांग्रेस विधायक विनोद यादव की कॉल आई कि दिल्ली में मैडम से मिलो। वे दिल्ली निकलने की तैयारी कर रहे थे कि उसके पहले लखनऊ से कॉल आ गई और दिल्ली नहीं जा सके। फिर बसपा में जाकर दो बार चुनाव लड़े मगर नजदीकी मुकाबले में भाजपा से हार गए। सपा को बुरी तरह पछाड़ा। विधायक मंजूर अहमद की हत्या के बाद सपा को बहेड़ी में उबरने नहीं दिया।

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