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संघमित्रा मौर्य के सहारे यादवों का गढ़ भेदने का गणित

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बदायूं। मौजूदा वक्त में अधिकतर जगहों पर भाजपा का झंडा लहरा रहा है, लेकिन बदायूं लोकसभा सीट पर पार्टी कभी कोई विशेष कमाल नहीं दिखा सकी। 2014 में चली मोदी लहर भी यहां पर कमल नहीं खिला सकी थी। अबकी बार पार्टी ने मौर्य वोटों को ध्यान में रखते हुए संघ मित्रा मौर्य को चुनाव मैदान में उतारा है। भाजपा प्रत्याशी संघमित्रा राजनीति में नई नहीं हैं लेकिन बदायूं वालों के लिए वह ‘नया चेहरा’ हैं। यह तो बाद ही में पता चलेगा कि जनता नए चेहरे पर भरोसा जताती है या नकार देती है, लेकिन इतना तय है कि यहां का मुकाबला रोचक होगा।
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पिछले 2014 के चुनाव में उत्तर प्रदेश से भाजपा को ऐतिहासिक सफलता मिली थी, लेकिन मोदी लहर के बाद भी बदायूं में भाजपा प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा था। इस लोकसभा सीट के इतिहास की बात करें तो वर्ष 1962 में यहां से भारतीय जनसंघ से ओंकार सिंह विजयी हुए थे। इसके बाद 1967 में उन्होंने फिर जीत हासिल की। 1991 में भाजपा ने बदायूं से स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती को मैदान में उतारा था। उन्होंने जनता दल के शरद यादव को पराजित कर पहली बार बदायूं में कमल खिलाया था, लेकिन इसके बाद कोई भी भाजपा प्रत्याशी बदायूं से संसद में नहीं पहुंचा। खास बात तो यह है कि 2014 के चुनाव में जब पूरे देश में मोदी लहर चल रही थी, तब भी पार्टी यहां कोई कमाल नहीं दिखा सकी। भाजपा प्रत्याशी वागीश पाठक यहां दूसरे नंबर पर रहे थे। वह सपा के धर्मेंद्र यादव से हार गए थे। इस बार भाजपा ने यहां से संघमित्रा मौर्य को टिकट दिया है। राजनीति पंडितों का कहना है कि लोकसभा क्षेत्र में मौर्य (शाक्य) मतदाता बड़ी संख्या में हैं। इसके अलावा भाजपा का अपना वैश्य व अन्य बिरादरी का वोट है। इसी को ध्यान में रखते हुए। इनका टिकट फाइनल हुआ। विदित हो कि संघमित्रा बदायूं के प्रभारी मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी हैं।

जातिगत वोट (लगभग)

सवर्ण-
ब्राह्मण- एक लाख
वैश्य- एक लाख 20 हजार
ठाकुर- एक लाख 25 हजार
कायस्थ- 30 हजार

मुस्लिम- तीन लाख 50 हजार

यादव-चार लाख
मौर्य-शाक्य- दो लाख 70 हजार
लोधे- 60 हजार
पाली- 40 हजार
नाई- 20 हजार
अनुसूचित जाति- दो लाख


कौन हैं संघमित्रा
संघमित्रा प्रदेश में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी हैं। स्वामी प्रसाद पर इस समय बदायूं के प्रभारी मंत्री का भी दायित्व है। प्रतापगढ़ जनपद की मूल निवासी डॉ. संघमित्रा एटा में वर्ष 2010 में जिला पंचायत सदस्य चुनी गयीं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मैनपुरी से प्रत्याशी के रूप में समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के खिलाफ चुनाव लड़ीं लेकिन हार गईं। अब भाजपा ने उन्हें बदायूं से टिकट दिया है। बदायूं सीट पर वर्ष 1996 से सपा का कब्जा चला आ रहा है।
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ये रही है पार्टी की स्थिति
- वर्ष 1991 में स्वामी चिन्मयानंद के चुनाव जीतने के बाद बदायूं फिर से यह सीट नहीं जीत पाई। हालांकि इससे पहले ओंकार सिंह ने वर्ष 1962 व 67 में चुनाव जीता था, लेकिन तब वह भारतीय जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़े थे। 1991 के बाद भाजपा कभी दूसरे तो कभी तीसरे नंबर पर रही। 1996 में भाजपा के प्रेमपाल सिंह तीसरे स्थान पर, 1998 के चुनाव तथा 1999 के उपचुनाव में भाजपा की शांतीदेवी दूसरे स्थान पर, 2004 में ब्रजपाल सिंह दूसरे स्थान पर तथा 2014 के चुनाव में बागीश पाठक दूसरे स्थान पर रहे थे। वर्ष 2009 में यह सीट भाजपा-जदयू के गठबंधन के कारण जद-यू के खाते में चली गई थी। तब यहां से चुनाव लड़े जद-यू के डीके भारद्वाज को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। वह चौथे स्थान पर रहे थे।

संघमित्रा 24 को आएंगी बदायूं
बदायूं। भाजपा जिलाध्यक्ष हरीश शाक्य ने बताया कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा बदायूं से घोषित प्रत्याशी डॉ. संघमित्रा मौर्य अपने पिता जिले के प्रभारी मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ रविवार को बदायूं आएंगी। बदायूं आगमन पर उनका जोरदार स्वागत किया जाएगा। उनका आगमन सुबह साढ़े 11 बजे होगा। इसके बाद वह भाजपा कार्यालय पर जाएंगी, जहां कार्यकर्ताओं से भेंट और परिचय होगा। स्वागत समारोह में पूरी लोकसभा के कार्यकर्ता भाग लेंगे।

पार्टी हाईकमान ने जो भी फैसला लिया है, वह सर्वमान्य है। सभी पदाधिकारी और कार्यकर्ता घोषित प्रत्याशी को मिलकर चुनाव लड़ाएंगे और चुनाव जिताकर लोकसभा में भेजेंगे।
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- हरीश शाक्य, जिलाध्यक्ष, भाजपा
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