बरेली। मुंबई से आए सेठ किलाचंद ने फतेहगंज पश्चिमी में सिंथेटिक्स एंड केमिकल यानी रबर फैक्ट्री वर्ष 1958 में विकसित की थी। सरकार और जिला प्रशासन ने इसके लिए माधोपुर, माली और रुकमपुर गांव की करीब 17 सौ एकड़ भूमि का अधिग्रहण कराया। अधिग्रहित भूमि सिर्फ 3.20 लाख रुपये में 90 वर्ष की लीज पर सेठ को सशर्त सौंपी गयी। शर्त के मुताबिक औद्योगिक गतिविधियां बंद होते ही लीज पर दी गई भूमि पर फिर सरकार काबिज हो जाएगी।
प्रशासनिक सूत्रों ने बताया कि सेठ किलाचंद ने दर्जन भर बैंकों से उद्योग चलाने के लिए करीब 147 करोड़ रुपये लोन लिया, जो आज बढ़कर कहीं ज्यादा हो चुका है। करीब 19 वर्ष पहले 1999 में फैक्ट्री घाटे होने पर बंद कर दी गई। इस बीच बीएसएफ आदि ने फैक्ट्री की खाली भूमि प्रशासन से ले ली। इससे कुल 1281 एकड़ जमीन फैक्ट्री के कब्जे में बची है। फैक्ट्री बंद होने पर तमाम कर्मी सड़कों पर आ गए, उनके बकाया अभी भी लंबित हैं। केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने किसी तरह चरणबद्ध तरीके से ईपीएफ भुगतान शुरू कराया है, अब कुछ ही राशि और कर्मी बचे हैं।
प्रदेश में भाजपा सरकार बनते ही एक फिर फैक्ट्री जमीन पर औद्योगिक गतिविधियाें सुगबुगाहट शुरू हुई। तब पता चला कि लीज पर दी गई जमीन बैंकाें में बंधक रखकर भारी भरकम लोन ले रखा है। साथ ही इसका विवाद मुंबई हाईकोर्ट और डीआरटी में लंबित है। फैक्ट्री प्रबंधक तालाबंदी की कानूनी प्रक्रिया भी पूरी नहीं करा पाया है। तत्कालीन डीएम आरवी सिंह ने ईपीएफ भुगतान होने पर ईपीएफ अफसर और एक निजी बैंक प्रबंधक आदि पर थाना कोतवाली में मुकदमा भी दर्ज कराया था। कार्रवाई पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी।