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पीओपी भी है, पर मिट्टी के हों श्रीगणेश

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पीओपी भी है, पर मिट्टी के हों श्रीगणेश
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बरेली।
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गणेश उत्सव शुरू होने वाला है। इस दौरान पंडालों में मूर्तियां स्थापित कर धूमधाम से पूजन और फिर श्रद्धा के साथ विसर्जन भी होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि मूर्तियां मिट्टी की हों या पीओपी की। शास्त्रीय विधान के अनुसार, मिट्टी और पत्थर ही शुद्ध हैं। इन्हीं में देवी-देवता का वास भी होता है। इसलिए, मिट्टी की मूर्ति ही स्थापित करनी चाहिए। वहीं, पीओपी एक केमिकल है जो अशुद्ध होने के साथ ही पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाता है। यह पानी में जल्दी घुलता भी नहीं है। शायद इसी को देखते हुए कोर्ट ने भी इस पर रोक लगाई है।
मराठा बुलियन एसोसिएशन श्री गणेश सेवा समिति के अध्यक्ष अनिल पाटिल बताते हैं कि उनके पंडाल में स्थापित की जाने वाली मूर्ति मिट्टी से ही बनती है। मूर्ति महाराष्ट्र से आती है। बताया, यह काली, लाल और सफेद मिट्टी से बनाई जाती हैं। आठ फीट ऊंची प्रतिमा की कीमत करीब 45 हजार रुपये होती है। वहीं, पीओपी से निर्मित प्रतिमा पर कम खर्च आता है। उन्होंने मिट्टी से बनी प्रतिमा ही लगाने की अपील की है। मिट्टी में होती है शुद्धता
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माडल टाउन स्थित श्री सनातन धर्म मंदिर के पुजारी पंडित गिरीश चंद्र मिश्रा बताते हैं कि पूजा में स्थापना के लिए मिट्टी की प्रतिमा ही लेनी चाहिए। मिट्टी में शुद्धता होती है। बताते हैं कि ऐसा शास्त्र सम्मत भी है। पीओपी की प्रतिमा स्थापित करना उचित नहीं है।
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पानी में मिल जाते हैं हानिकारक तत्व
बरेली कॉलेज के रसायन शास्त्र विभाग में प्रो. डॉ. एसके शर्मा का कहना है कि पीओपी में कुछ आर्गेनिक तत्व होते हैं। इसमें जिप्सम, स्ट्रांशियम और जिंक होता है जो पानी को क्षारीय करने के साथ हार्ड भी बनाता है। पेंट और डाई भी नुकसान करते हैं। इन्हें विसर्जित करने से पानी में रहने वाले जीव-जंतुओं को नुकसान होता है। ऐसा पानी सिंचाई के लिए भी ठीक नहीं होता है।

 
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