बरेली। जिला अस्पताल जहां लोग जिंदगी और मौत के सवाल लेकर पहुंचते हैं, वहां के अफसरों का यह असली चेहरा है जो आपको इन तस्वीरों में मुस्कराता दिख रहा है। यह बेहया मुस्कान उस मासूम की मौत के ऐन बाद की है, जो इस दुनिया में आने के चंद रोज बाद ही सिस्टम का वीभत्स चेहरा देखकर वापस कूच कर गई। एक मासूम की मौत पर यह मुस्कराहट किसी सरकारी अस्पताल में नई नहीं थी। जिला अस्पताल के अलावा देहात के सरकारी अस्पतालों में इससे पहले भी तमाम लोग इलाज मिलने के धोखे में मौत का शिकार हो चुके हैं। अगर स्वास्थ्य विभाग या प्रशासन के उच्चाधिकारियों का ध्यान कभी इन मौतों की तरफ गया होता तो शायद न बुधवार को जिला अस्पताल में इस मासूम की मौत होती न सीधे मुख्यमंत्री को बच्चे की मौत का संज्ञान लेकर पुरुष और महिला दोनों अस्पतालों के सीएमएस को निलंबित करना पड़ता।
जिला अस्पताल में मरीजों से बदसलूकी की घटनाएं आम हैं। न जाने कितनी शिकायतें ‘जांच’ की आड़ में निपटाई जा चुकी हैं। सिस्टम की इस बेशर्मी की हद तब सामने आई जब बुधवार को बीमार बच्ची की मौत के बाद पुरुष अस्पताल के सीएमएस डॉ. केएस गुप्ता का मुस्कुराता चेहरा मीडिया के कैमरों में कैद हो गया। इसके बाद ही यह कहानी ऊपर तक पहुंची कि एक पिता पांच दिन की बच्ची को लेकर जिला अस्पताल और जिला महिला अस्पताल की दौड़ लगाता रहा। तीन घंटे दोनों अस्पतालों के डॉक्टरों की खुशामद करते हुए गुजर गए, लेकिन फिर भी बच्ची को इलाज नहीं मिला। यह क्रूरता बच्ची पर इतनी भारी गुजरी कि उसने अपने पिता की गोद में ही दम तोड़ दिया। बच्ची की मौत के बाद उसका पिता जब जिला अस्पताल के सीएमएस डा. केएस गुप्ता के पास पहुंचा तब भी उसे दिलासा देने के बजाय तमाम सवाल किए गए। आंखों में आंसू लिए मृत बच्ची को अपनी गोद में संभालते हुए पिता सवालों का जवाब देता रहा और सीएमएस मुस्कुराते रहे। महिला अस्पताल की सीएमएस भी शर्मसार होने के बजाय पुरुष अस्पताल के सीएमएस पर जिम्मेदारी टालती रहीं। शासन ने महिला अस्पताल की सीएमएस के खिलाफ भी विभागीय जांच के आदेश दिए हैं। शासन से दोनों सीएमएस के निलंबन का फरमान आने के बाद ही एडी हेल्थ डॉ. प्रमिला गौड़ ने बताया कि संयुक्त निदेशक डॉ. एसके अग्रवाल और डा. नरेंद्र को मौके पर भेजकर पूरे मामले की जांच रिपोर्ट मांगी गई है। इसमें जो भी दोषी मिलेगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
‘अपनों’ को बचाने में लगे रहे दोनों सीएमएस
बच्ची के इलाज में तो किसी सीएमएस ने जरा भी ऊर्जा नहीं लगाई लेकिन उसकी मौत के बाद मीडिया के सामने एक-दूसरे को उसकी मौत का जिम्मेदार साबित करने में पूरी ताकत झोंक दी। जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. केएस गुप्ता का कहना था कि प्रीमैच्योर बच्ची उर्वशी का पर्चा बनवाकर उसके पिता ने ओपीडी में शिशु रोग विशेषज्ञ ़डॉ. एसएस चौहान को दिखाया था। बच्ची की हालत गंभीर थी, इसलिए उन्होंने उसे जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड के लिए रेफर कर दिया था। महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. अलका शर्मा का कहना था कि बच्ची को लेकर उसके पिता पहले जिला अस्पताल पहुंचे थे। वहीं पर्चा बना, डॉक्टर ने उसे देखा भी, लेकिन भर्ती करके प्राथमिक उपचार तक नहीं किया। अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए उसे महिला अस्पताल भेज दिया। महिला अस्पताल में कुल चार फोटो थेरेपी वार्मर हैं जिन पर आठ बच्चे पहले से थे और कोई बेड खाली नहीं था। इसी कारण डॉ. सौरभ ने बच्ची को जिला अस्पताल की इमरजेंसी में भेज दिया था।
अफसरों की ‘जंग’ में बच्चा वार्ड की इंचार्ज ने भी घुमाई तलवार
जिस वक्त दोनों सीएमएस मीडिया के सामने सफाई पेश कर रहे थे. उसी दौरान बच्चा वार्ड की इंचार्ज डेजी सिंह ने जिला अस्पताल के सीएमएस की पैरवी शुरू कर दी। बोलीं, बुधवार को उनके वार्ड में तीन लोगों ने अपने बच्चों को यह लिखित शिकायत देकर भर्ती कराया है कि महिला अस्पताल ने उनके बच्चे को भर्ती करने से इंकार कर दिया है। उसने तीनों बच्चों के परिवारों की लिखित शिकायत भी दिखाई। महिला अस्पताल की सीएमएस डा. अलका शर्मा कह रही थीं कि यदि कोई अपने बच्चे को जिला अस्पताल लेकर पहुंचता है तो उसे बिना भर्ती और इलजा किए महिला अस्पताल भेज दिया जाता है। रोज ऐसे केस आते हैं। जिला अस्पताल अपनी जिम्मेदारी से बच रहा है।