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सफेदपोश की ‘मुट्ठी’ में कैद सस्ते सरकारी राशन का काला खेल

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बरेली। नेताजी की मुट्ठी में सस्ता सरकारी राशन देने वाला पूरा सिस्टम ही कैद है। अगर कोई कोटेदार नेताजी की आंखों की किरकिरी बनता है तो पहले शिकायत, फिर जांच और आखिर में कोटा सस्पेंड। बाद में दिखावे की चयन प्रक्रिया के बाद चहेतों को कोटा दे दिया जाता है। बाद में अफसर, नेता और कोटेदार सभी मिलजुलकर गरीबों का हजारों क्विंटल अनाज डकार जाते हैं। हद तो यह है कि कोटेदार ही नहीं, फर्जी राशनकार्ड बनाने में होने वाला खेल भी नेताजी के संरक्षण में चल रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सरकारी सिस्टम में नजर गड़ाए माफिया के चंगुल से निकलकर गरीबों की थाली तक सस्ता राशन पहुंचे भी तो कैसे?
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राजनेताओं की शह पर राशन दुकानों की चयन प्रक्रिया से ही गड़बड़ी का खेल शुरू हो जाता है। सत्ता बदलने के साथ ही वे कोटेदार क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के निशाने पर आने शुरू हो जाते हैं तो दूसरे दल के हैं या फिर वह उनके सिस्टम में सेट नहीं हो पा रहे हैं। अपने ‘कृपा पात्रों’ को कोटे की दुकानें आवंटित हो सके। इसके लिए पुराने कोटेदारों की घेराबंदी करते हुए तमाम शिकायतें कराई जाती हैं। जांच शुरू होने के बाद समझौते की लिए सौदेबाजी होती है। बात बन गई तो ठीक, वरना अपनी हनक का पूरा इस्तेमाल करते हुए तहसील और पूर्ति विभाग के कर्मचारियों से मनमाने तरीके से जांच कराकर कोटे को सस्पेंड और फिर बर्खास्त करा दिया जाता है। कोटे की नई दुकानों के चयन के नाम पर भी खुली बैठक में केवल दिखावे का कोरम ही पूरा होता है। नेताजी जो चाहते हैं, सरकारी तंत्र आंखों पर पट्टी बांधकर वह सब पूरा करता चला जाता है। बाद में नेताजी के चहेते कोटेदार सैकड़ों क्विंटल गरीबों को देने के बजाय राशन की कालाबाजारी कर देते हैं।

केवल हाथ खड़ा करके नए कोटेदार का हो जाता है चयन
अगर किसी जगह नए कोटेदार का चयन होता है तो संबंधित ग्राम पंचायत में प्रधान को खुली बैठक बुलानी पड़ती है। इसमें तहसील और पूर्ति विभाग के अधिकारी भी मौजूद रहते हैं। इसमें कोटेदार के नाम पुकार कर लोगों से हाथ खड़े कराए जाते हैं। बताते हैं कि इसकी सही से गिनती भी नहीं होती और मनमाने तरीके से कोटेदार का चयन घोषित कर दिया जाता है। ऐसे मामलों में गड़बड़ी की शिकायतों में भी अक्सर कुछ नहीं होता।
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घटतौली करके कोटेदार नेताजी की भरते हैं झोली
पात्र गृहस्थी हो या अंत्योदय राशन कार्ड, कोटेदार दोनों ही स्कीमों के राशन में बेरोकटोक घटतौली करते हैं। बताते हैं कि दूर गांवों में प्रति कार्ड पर एक किलो और कस्बों में आधा किलो तक कम राशन दिया जाता है। इस तरह कोटेदार हर माह सैकड़ों किलो राशन का आवंटन न करके उसके एवज में नेताजी के घर पर हर माह चढ़ावा भेज दिया जाता है। भ्रष्ट सिस्टम में गरीब शिकायत भी करें तो सुनवाई कहां होनी।

बड़े आढ़तियों के गोदामों में पहुंचा दिया जाता है राशन
कोटेदारों से ही नहीं, नेता और आढ़तियों के गठजोड़ ने भी सस्ता राशन देने की प्रणाली को खोखला कर दिया है। बताते हैं तमाम कोटेदार सरकारी गोदाम से अनाज तो उठाते हैं लेकिन वह उनके अपने गोदामों पर नहीं जाता। आढ़तियों से सांठगांठ करने के बाद उस राशन को सीधे निजी गोदामों में पहुंचा दिया जाता है। पिछले साल नवंबर में रिठौरा राशन घोटाले में भी सरकारी राशन को एक आढ़ती के गोदामों में उतारा जा रहा था। नेता और अफसरों से सेंटिंग का नतीजा रहा कि पूर्ति विभाग ने पहले इसे सरकारी राशन माना ही नहीं। बाद में डीएम ने जांच कराई तो इसमें भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें सामने आ गईं।

केस-एक : फरीदपुर के इनायतपुर में करीब तीन साल पहले कोटे की दुकानों के चयन में गड़बड़ी हो रही थी। खुली बैठक में केवल हाथ खड़े कराकर वोट देने की औपचारिकता पूरी की जा रही थी। ग्रामीणों के विरोध के बाद प्रशासन को यहां पर्चियों से वोट डलवाने पड़े।
केस-दो : पिछले साल रिठौरा में एसपी देहात ने राशन लदी पिकअप पकड़ी थी। यह सरकारी अनाज एक आढ़ती के गोदाम में उतारा जा रहा था। इसमें क्षेत्र के इसमें एक नेताजी के इशारे पर जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई। इसमें आढ़ती कमल गुप्ता सहित पांच लोगों पर एफआईआर दर्ज हो गई।
केस-तीन : फरीदपुर के मोहनपुर ढंढरूवा में मनमाने पूर्ति विभाग ने मनमाने ढंग से एक ही जगह पर कोटे की दो दुकानें चिह्नित कर दीं। जबकि उपभोक्ताओं की संख्या कम थी। इस मामले में एक कोटेदार कोर्ट चला गया।
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