शाही। मुफलिसी से जूझते लतीफ मियां दो जून की रोटी के लिए राशन कार्ड पाने की ख्वाहिश लिए ही चल बसे लेकिन जब जवाब देने की बारी आई तो सरकारी सिस्टम ने लतीफ मियां की मौत को ‘लतीफा’ बना दिया। ‘साहब’ लोगों को ऊपर जवाब देने में दिक्कत न हो, इसलिए लेखपाल ने अपनी रिपोर्ट में शुरू से आखिर तक गोलमाल कर दिया। जिस घर में अक्सर चूल्हा तक नहीं जल पाता, उसकी माली हालत ठीकठाक बता दी। रिपोर्ट का सबसे बड़ा झूठ यह है कि लतीफ मियां के खाते में उनकी मृत्यु के वक्त 4860 रुपये जमा थे। उनके बैंक खाते की स्टेटमेंट यह रकम सिर्फ 532 रुपये बता रही है।
लतीफ मियां के बेटे शब्बू के मुताबिक छह जून को उसके अब्बू की मौत के बाद तहसील के अफसरों ने अपनी गर्दन बचाने के लिए लेखपाल मोरपाल गंगवार को कुछ ‘बड़े’ लोगों के साथ उनके घर भेजा था। कस्बे के ही कुछ ऐसे लोग भी इस बीच उनके घर पहुंच गए जो आम तौर पर तहसील और नगर पंचायत के चक्कर काटते रहते हैं। शब्बू के मुताबिक लेखपाल मोरपाल गंगवार ने अपनी रिपोर्ट में दिखाया है कि उनके अब्बू एक महीने से बीमार थे जबकि असलियत यह है कि वह एक साल से बीमार चल रहे थे। पैसे की कमी से इलाज कराना तो दूर उन्हें ठीक से खाना तक नहीं मिल पा रहा था। इसी वजह से उनकी बीमारी और बढ़ गई थी। लेखपाल ने अपनी रिपोर्ट में इसका जिक्र तक नहीं किया। न बैंक जाकर खाते में मौजूद सही धनराशि जानने की जरूरत समझी। घर बैठे-बैठे ही खाते में 4860 रुपये बैलेंस होने की बात रिपोर्ट में लिख दी जबकि पासबुक में यह एंट्री 23 नवंबर 2017 की थी। अब उनके खाते में 532 रुपये ही हैं।
शब्बू ने बताया कि लेखपाल बयान तो उनका लेने आए थे, लेकिन उनकी बात सुनने के बजाय साथ आए कुछ खास लोगों की बात ही सुनकर अपने हिसाब से बयान लिख रहे थे। अपनी लिखा-पढ़ी पूरी करने के बाद उन्होंने उस पर इस रिपोर्ट पर दस्तखत करने पर भी काफी जोर दिया। यहां तक कहा कि अगर रिपोर्ट पर दस्तखत नहीं करोगे तो काफी नुकसान हो जाएगा। उनके साथ आए लोग भी इसके लिए उन पर दबाव बनाते रहे।
अक्सर भूखा सोना पड़ता है
शब्बू ने बताया कि अब्बू की मौत के बाद जिंदगी बेहद मुफलिसी में गुजर रही है। उनकी परेशानी देखकर मोहल्ले के कुछ लोग खाने पीने का सामान भेज देते हैं तो दोनों भाई-बहन पेट भर लेते हैं, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि दोनों को भूखे ही सोना पड़ता है।