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सीएमओ और सीएमएस की लापरवाही भी उजागर

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शाहजहांपुर। नौ साल के बच्चे का शव लेकर अस्पताल में भटकने का मामले की गूंज शासन तक पहुंच गई है। प्रारंभिक जांच में सीएमओ और सीएमएस की लापरवाही सामने आई है। संयुक्त निदेशक का कहना है कि एंबुलेंस नहीं थी तो दोनों अधिकारियों को कोई दूसरी व्यवस्था करनी चाहिए थी। फिलहाल महानिदेशक चिकित्सा ने पूरे मामले में रिपोर्ट मांगी है। बुधवार को जेडी (नोडल अधिकारी शव वाहन) डॉ. नरेंद्र जांच के लिए शाहजहांपुर पहुंचे।
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शहर के ईदगाह रोड स्थित मोहल्ला बीवीजई हद्दफ निवासी शकील के नौ साल के बेटे अफरोज की सोमवार को बुखार से तबीयत बिगड़ गई थी। अफरोज की मां नूरजहां उर्फ राबिया उसको लेकर जिला अस्पताल पहुंची। इलाज में लापरवाही से अफरोज की मौत हो गई। जिला अस्पताल शहर से करीब सात किलोमीटर दूर है। राबिया को अफरोज का शव घर तक लाना था। जिले में तीन शव वाहन होने के बावजूद वह अफरोज का शव गोद में लिए भटकती रही। शव वाहन नहीं मिल सका। आखिर लोगों ने चंदा करके पिकअप वाहन किया। इससे शव घर तक पहुंचा। जिला अस्पताल प्रशासन की यह संवेदनहीनता अखबारों की सुर्खियां बनीं तो जिला प्रशासन से लेकर शासन तक धमक पहुंची। डीएम अमृत त्रिपाठी ने मंगलवार को जिला अस्पताल का निरीक्षण किया। मामले में जांच सिटी मजिस्ट्रेट अरविंद कुमार को सौंप दी।
अब मामले में डीजी हेल्थ ने रिपोर्ट तलब की है। एडी हेल्थ डॉ. प्रमिला गौड़ ने मामले में सीएमओ और सीएमएस से फोन पर बात की। बुधवार को जेडी हेल्थ और नोडल अधिकारी डॉ. नरेंद्र कुमार भी जांच को शाहजहांपुर पहुंचे। सूत्रों ने बताया कि पूरे प्रकरण में सीएमओ डॉ. आरपी रावत, ईएमओ डॉ. अनुराग पाराशर, उस समय तैनात स्टाफ की भूमिका संदेह के घेरे में आई है। इधर, सिटी मजिस्ट्रेट ने भी अपनी रिपोर्ट डीएम को सौंप दी है। देर सबेर इस मामले में कई लोगों पर कार्रवाई हो सकती है।
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मामला बेहद संवेदनहीन है। डीजी को रिपोर्ट भेजी जा रही है। प्रकरण में जांच जेडी डॉ. नरेंद्र कुमार कर रहे हैं। आज उनको शाहजहांपुर भेजा है। जेडी ने ईएमओ, पीड़िता और स्टाफ के बयान भी दर्ज किए हैं। प्रथम दृष्टया इसमें सीएमओ और सीएमएस की लापरवाही की बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता। नीचे के स्टाफ की भी जिम्मेदारी बनती है। किसी के शव का अपमान नहीं होना चाहिए। अगर शव वाहन उपलब्ध नहीं था तो सीएमएस, सीएमओ को अन्य कोई व्यवस्था करनी चाहिए थी। फिलहाल जांच चल रही है। डीजल और स्टाफ के वेतन के मामले में भी जांच की जा रही है। कुछ अनियमितताएं सामने आई हैं। जांच पूरी होने से पहले ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता।
- डॉ. प्रमिला गौड़, संयुक्त निदेशक चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाएं।

शव वाहनों पर हर महीने 90 हजार खर्च
शाहजहांपुर। शव वाहनों के डीजल और स्टाफ के वेतन में भी बड़ा खेल हो रहा है। बिना पहिया घूमे हर महीने डीजल और स्टाफ के वेतन पर मोटा बजट खर्च हो रहा है। जिले में तीन शव वाहन होने के बावजूद शव की दुर्दशा कोई नया मामला नहीं है।
शासन की मंशा है कि जिला अस्पताल से शव को पूरे सम्मान के साथ घर तक पहुंचाया जाए। जिले में तीन आधुनिक शव वाहन हैं। एक शव वाहन की कीमत करीब 40 लाख रुपये है। दो जिला अस्पताल और एक बंडा सीएचसी पर रहता है। एक शव वाहन पर प्रति माह करीब 30 हजार रुपये खर्च होते हैं। इस तरह तीन शव वाहनों पर प्रति माह 90 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं। शव वाहन पर 24 घंटे कर्मचारियों की ड्यूटी होती है। डीजल और कर्मचारियों का वेतन भी शासन देता है। इसके बावजूद शव वाहन का लाभ आम लोगों को न मिलना चिंता का विषय है। शव वाहनों का पहिया घूमे बिना हर महीने बजट ठिकाने भी लग रहा हे। ऐसी संवेदनहीनता सामने आने के बाद अब लोगों को दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का इंतजार है।
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