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आंवला: सारे रिश्ते-नाते टूटे.. मोदी के लिए ‘अपने’ भी छूटे

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फरीदपुर/बरेली। मोदी के साथ आंवला के मतदाताओं ने ऐसी कदमताल मिलाई कि सारे के सारे पूर्वानुमान अपने पांव तले रौंद डाले। धमेंद्र कश्यप के बयानों से नाराज जिन ठाकुर मतदाताओं को अपनी बिरादरी के पुराने दिग्गज नेता सर्वराज सिंह के साथ जाना था, वे कुछ कदम साथ चले लेकिन फिर एकाएक ऐन मौके पर उन्हें छोड़कर मोदी की तरफ मुड़ गए। इससे भी ज्यादा हैरतअंगेज यह रहा कि जिन यादवों और दलितों के दम पर सपा और बसपा ने कई-कई बार उत्तर प्रदेश में शासन किया, उनका मोह और पुराना रिश्ता भी इन दोनों बिरादरी के मतदाताओं को इस बार मोदी की सरकार बनाने से नहीं रोक सका।
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मोदी का जादू किस कदर मतदाताओं के सिर चढ़कर बोला इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तीन बार सांसद रह चुके कांग्रेस प्रत्याशी सर्वराज सिंह आंवला क्षेत्र के अपने पैतृक गांव बुधौली में ही भाजपा से ज्यादा वोट हासिल नहीं कर सके। बुधौली भाजपा को 166 वोट मिले लेकिन सर्वराज सिंह को 122 वोट ही मिल पाए। ठाकुर बहुल गांव खजुरिया में भी भाजपा को 430 तो कांग्रेस को सिर्फ 67 वोट मिले। ठाकुरों के गांव गांगेपुर, रम्पुरा रतन, पिपरथरा चठिया फैजू, शिवपुरी, वेवलबरकतपुर, तराखास , खटेली , रम्पुरा रतन, सिसईया मगनपुर जिगनिया हरचालमुहाल,रायपुर हंस, लौगपुर आदि में भी सर्वराज भाजपा से हार गए। आंवला के दिग्गजों का मानना है कि मुसलमानों का कांग्रेस प्रत्याशी का साथ छोड़ना भी इसका एक कारण रहा। जब ठाकुरों को लगा कि मुस्लिम वोट कांग्रेस को नहीं मिल रहे हैं तो वे भी हारते हुए सर्वराज को छोड़कर भाजपा में चले गए।
बाकरगंज, धौरेरा जैसे अनुसूचित जाति की बहुलता वाले कई गांवों में भी भाजपा ने परचम लहराया। बसपा इन गांवों में कोई कमाल नहीं दिखा पाई। दूधवालों ने बसपा का साथ देने के बजाय फिर चाय पीना ज्यादा बेहतर समझा। यादव बहुल तमाम गांवों में भाजपा ने बढ़त बनाई। मेहरपुर करोड़ ऐसा गांव है जिसमें पूर्व ब्लॉक प्रमुख नरेंद्र यादव मुखर्जी, पूर्व ब्लॉक प्रमुख राजबाबू यादव, पूर्व सपा जिला उपाध्यक्ष अरविंद यादव खुद और उनका परिवार रहता है। इस गांव में भी सपा का दशकों पुराना किला ढह गया। यहां भाजपा को 1140 वोट मिले तो बसपा 620 वोट पर सिमट गई। एक जिला पंचायत सदस्य सपाई होने के बाद भी कांग्रेस प्रत्याशी को वोट डलवाते दिखे। हालांकि कांग्रेस को सौ से ज्यादा वोट नहीं दिला पाए। यादव बहुल गांव रसुइया में एक बूूथ पर भाजपा जीती और दूसरे यादव बहुल बूथ पर बसपा। यादव बहुल गांव ओसढ में भाजपा को 187 वोट मिले जबकि बसपा को 340। यादव बहुल गांव नवादा वन में भाजपा को सात सौ से ज्यादा वोट मिले। इस गांव में यादवों के अलावा जाटव भी हैं, फिर भी बसपा को 375 वोट मिल पाए। यादव-जाटव बहुल गांव जरौल में भाजपा को 200, बंडिया खुर्द में 237, जटौआ में 149 वोट मिल गए। यादवों का कहना है कि अगर सपा आंवला में साइकिल निशान से चुनाव लड़ती को उनके वोट इन गांवों में सपा को ही मिलते लेकिन बसपा को उन्होंने भाजपा से बेहतर नहीं समझा। लिहाजा भाजपा को ही वोट दे दिए।
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कभी एक वोट के लिए तरसती थी भाजपा
एक समय था जब इस इलाके में मुलायम सिंह यादव का जादू चलता था। मुलायम सिंह की एक आवाज पर सपा को थोक के भाव यादवों के वोट मिलते थे। भाजपा एक-एक वोट को तरस जाती थी। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी विजय पाल सिंह विधानसभा क्षेत्र का आखिरी यादव बहुल गांव सैदापुर का पोलिग खुलने के बाद 235 वोटों से चुनाव हार गए थे क्योंकि उन्हें वहां पर एक भी वोट नहीं मिला था और कुछ वोटों की जो बढ़त उनकी बनी हुई थी वह इस गांव में आकर खत्म हो गई।
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फरीदपुर: हर गांव में खिला कमल

ठाकुरों ने कहीं ज्यादा तो कहीं बराबर वोट बांटे
गांव का नाम भाजपा बसपा कांग्रेस
बुधौली 407 488 277
चठिया फैजू 323 10 84
गांगेपुरा 460 36 83
खटेली 784 488 166
गांगेपुरा 370 37 18

यादवों को भी अखिलेश का प्रयोग नहीं भाया
रसुइया 568 610 ---
केसरपुर 186 280 18
वीरपुर 152 332 10
सैदपुर मंझा 116 382 7
जरौल 200 328 37

कई गांवों में दलित भी छोड़ गए बसपा का साथ
बाकरगंज 435 524 17
मेवापटटी 198 268 59
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