फरीदपुर/ बरेली। आंवला के मतदाताओं पर मोदी का जादू सिर चढ़कर बोला। यादव मतदाता बसपा को वोट देने से किनारा कर दिए, जिसका खामियाजा बसपा प्रत्याशी रुचिवीरा को हार के रूप में भुगतना पड़ा। उधर, पूर्व सांसद और कांग्रेस प्रत्याशी अपने गांव से ही भाजपा प्रत्याशी धर्मेंद्र कश्यप से पराजित हो गए। भाजपा से ठाकुर चुनाव से पहले नाराज बताए गए, लेकिन जब मतदान की बारी आई तो ठाकुर मतदाताओें ने सर्वराज के बजाय भाजपा को ही वोट देना मुनासिब समझा। भाजपा प्रत्याशी धर्मेंद्र कश्यप को उम्मीद से अधिक वोट मिले और वह बड़े अंतर से चुनाव जीत गए।
आंवला लोकसभा में मोदी मैजिक के चलते सपा-बसपा के जातीय समीकरण पूरी तरह धराशायी हो गए। कांग्रेस प्रत्याशी सर्वराज सिंह का पैतृक गांव बुधौली है। इस गांव में भाजपा को 166 वोट मिले, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी सर्वराज सिंह को मात्र 122 वोट ही मिल सके। अन्य ठाकुर बहुल गांव खजुरिया में भाजपा को 430 तो कांग्रेस को 67 वोट मिल पाए। यह माना जा रहा था कि ठाकुर मतदाता सजातीय सर्वराज सिंह को ही वोट देंगे क्योंकि आंवला में ठाकुरों का अच्छा खासा वोट बैंक है। मगर ठाकुर बहुल गांव गांगेपुर, रम्पुरा रतन, पिपरथरा चठिया फैजू, शिवपुरी, वेवलबरकतपुर, तराखास , खटेली , रम्पुरा रतन, सिसईया मगनपुर जिगनिया हरचालमुहाल,रायपुर हंस, लौगपुर आदी में कांग्रेेस प्रत्याशी को भाजपा से हार मिली। ठाकुर बहुल अधिकांश गांवों में भाजपा ने जीत दर्ज की। मुस्लिम मतदाताओं ने मतदान के अंतिम समय में कांग्रेस प्रत्याशी का साथ छोड़ दिया। जब ठाकुरों को यह लगा कि मुस्लिम वोटर सर्वराज को नहीं मिल रहे हैं तो वह भाजपा में चले गए।
दलित और यादवों को नहीं रास आयी बसपा
- सपा दिग्गजों के यादव बहुल गांव में भाजपा को बढ़त
मोदी के जादू के चलते अनुसूचित जाति बहुल गांव बाकरगंज, धौरेरा जैसे गांव में भाजपा ने जीत दर्ज की। बसपा इन गांवों में कोई कमाल नहीं दिखा पाई। सपा के माने जाने वाले यादव मतदाता भी बसपा को सहन नहीं कर पाए। यादव बहुल गांवों में भी भाजपा ने बढ़त बना ली। ग्राम मेहरपुर करोड जिले का ऐसा गांव है, जिसमें पूर्व ब्लाक प्रमुख नरेंद्र यादव मुखर्जी, पूर्व ब्लाक प्रमुख राजबाबू यादव पूर्व सपा जिला उपाध्यक्ष अरविंद यादव स्वयं या उनका परिवार रहता है। इस गांव में भी मोदी फैक्टर हावी रहा। मेहतरपुर करोड़ में 1140 वोट भाजपा को मिले तो बसपा को मात्र 620 वोट ही मिल सके। एक जिला पंचायत सदस्य सपाई होने के बाद भी कांग्रेस प्रत्याशी के वोट डलवा रहे थे। फिर भी कांग्रेस को मात्र 100 वोट ही दिला पाए। यादव बहुल गांव गांव रसुईया,में एक बूूथ पर भाजपा जीती जबकि दूसरे यादव बहुल बूथ पर बसपा। यादव बहुल गांव ओसढ में भाजपा को 187 वोट मिले जबकि बसपा को 340। यादव बहुल गांव नवादा वन में सात सौ से अधिक वोट भाजपा को मिले। इस गांव में यादवों के अलावा जाटव वोटर भी हैं। फिर भी बसपा को 375 वोट ही मिल पाए। यादव-जाटव बहुल गांव जरौल में भाजपा को 200, बंडिया खुर्द में 237, जटौआ में 149 वोट मिल गए। अगर सपा आंवला में साइकिल निशान से चुनाव लड़ती को यादव बहुल इन गांवों में पूरा का पूरा वोट सपा को मिलता। यादवों ने इन गांवों में बसपा से बेहतर भाजपा को समझा और वहीं वोट भी दे दिए।
कभी यहां एक वोट को तरसती थी भाजपा
एक समय था, जब मुलायम सिंह यादव का इस इलाके में जादू चलता था। मुलायम की एक आवाज पर सपा को थोक के भाव यादवों के वोट मिलते थे। भाजपा एक एक वोट को तरस जाती थी। वर्ष 2002 विधान सभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी विजय पाल सिंह विधानसभा के आखिरी यादव बहुल गांव सैदापुर का पोलिग खुलने के बाद चुनाव हार गये थे क्योंकि वहां पर एक भी वोट भाजपा को नहीं मिला था। उनकी बढ़त खत्म हो गई। वह मात्र 235 वोटों से चुनाव हारे थे।