बरेली। अपने शहर से हवाई जहाज उड़ाने की योजना अभी तक हवा-हवाई है। लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने की आशंका में फरवरी में पूरे सिस्टम में करंट दौड़ा तो आनन-फानन में बरेली से हवाई जहाज उड़ाने के लिए जरूरी काम पूरे कराकर हवाई अड्डे का उद्घाटन भी करा दिया लेकिन यहां से उड़ान कब शुरू होगी, यह जवाब अब भी किसी के पास नहीं है। फरवरी के ही आखिरी सप्ताह में जेट एयरवेज के अधिकारियों ने 15 अप्रैल से बरेली से उड़ान शुरू करने की अनुमति के लिए रक्षा मंत्रालय को पत्र लिख दिया था, लेकिन इसका जवाब अब तक रक्षा मंत्रालय से नहीं आया है। उधर, शहरवासी बेसब्री से 15 अप्रैल से हवाई यात्रा के ख्वाब देख रहे हैं। अगर यह सपना पूरा हुआ तो चुनाव में यह सत्ताधारी दल के लिए अच्छा मुद्दा बनने की संभावना है, लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाया तो इस नाकामी को विरोधी दलों की ओर से इस मुद्दे को उसके खिलाफ इस्तेमाल किए जाने की भी पूरी संभावना है।
बरेली से हवाई उड़ान शुरू करने की योजना पर 1997 में विचार शुरू हुआ था। धीरे-धीरे योजना धरातल पर आई, लेकिन प्रशासनिक और सरकारी तंत्र ने इस पर क्रियान्वयन शुरू करते-करते 21 साल का वक्त यानी एक पूरी मुद्दत खपा दी। लोकसभा चुनाव के साल में इस पर गंभीरता से काम शुरू हुआ। लोकसभा चुनाव में हवाई अड्डे का क्रेडिट लेने के लिए सरकार की ओर से जल्द से जल्द इसके काम पूरे करने का दबाव बनाया गया। इसके बावजूद एक के बाद एक काम अटकते रहे। चूंकि सरकार की मंशा आचार संहिता लागू होने से पहले हवाई अड्डे का उद्घाटन कराने की थी, लिहाजा आखिरी वक्त में तेजी आई और दो महीने के अंदर सिस्टम ने सक्रियता दिखाकर हवाई अड्डे को उद्घाटन लायक बना दिया। हवाई अड्डे में पोर्टा केबिन बनने के साथ जरूरी मशीनें भी लग गईं। टैक्सी वे और एप्रेन जैसे काम भी आनन-फानन में पूरे हुए। लेकिन यहां से उड़ान शुरू करने की सारी औपचारिकताएं फिर भी पूरी नहीं हो पाईं। फरवरी के आखिरी सप्ताह में जेट एयरवेज की ओर से 15 अप्रैल से बरेली हवाई अड्डे से उड़ानें शुरू करने के लिए रक्षा मंत्रालय को पत्र लिखा गया था जिसका जवाब अब तक नहीं आया है। उधर, उद्घाटन होने के बाद सिस्टम फिर सुस्त हो गया है।
22 सालों की कवायद के बाद भी नहीं उड़ा पाए हवाई जहाज
उत्तराखंड, दिल्ली और लखनऊ को बरेली से हवाई सेवा से जोड़ने के लिए 1997 में भाजपा और बसपा की संयुक्त सरकार में सिविल एन्क्लेव बनाए जाने की योजना की शुरुआत कर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने यहां इसकी आधारशिला रखी थी। राजनीतिक उथल-पुथल के बीच मायावती की सरकार इससे ज्यादा कुछ नहीं कर पाई। इसके बाद राज्य में बसपा और सपा की सरकारें आती-जाती रहीं लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल की कमी की वजह से इस परियोजना की फाइल जहां की तहां पड़ी रही। लंबा वक्त गुजरने के साथ लोगों के जहन से यह प्रोजेक्ट धीरे-धीरे गायब होने लगा। एक अरसे के बाद 2012 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सिविल एन्क्लेव के प्रोजेक्ट को फिर जिंदा किया। इसे पूरा करने के लिए करीब 12 करोड़ रुपये की धनराशि भी आवंटित कर दी गई। यह बजट तो राज्य के खाते में पहुंच गया लेकिन राज्य सरकार ने फिर भी सिविल एन्क्लेव के लिए कोई तेजी नहीं दिखाई। नतीजा यह हुआ कि यह प्रोजेक्ट फिर गर्त में चला गया। इसके बाद वर्ष 2017-18 में केंद्र के साथ राज्य में भी भाजपा की सरकार आई तो बरेली में हवाई अड्डा बनाने की परियोजना को एक बार फिर पंख लगे। करीब 80 करोड़ के इस प्रोजेक्ट की डीपीआर तैयार कराते हुए राज्य सरकार और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने संयुक्त तौर से इस पर काम करना शुरू किया। राज्य सरकार ने हवाई अड्डे के लिए पीलीभीत हाईवे के किनारे मयूर वन चेतना केंद्र के पास करीब 44 एकड़ भूमि का अधिग्रहण करा कर दिया।
हवाई अड्डे पर करीब 60 फीसदी काम शेष
धूल फांकने लगी मशीनें, 45 करोड़ से मेन बिल्डिंग बननी बाकी
एयरपोर्ट अथॉरिटी के अधिकारियों ने 10 मार्च को हवाई अड्डे की बिल्डिंग के उद्घाटन के लिए एक्सरे, सिक्योरिटी सहित तमाम मशीनें मंगवा कर यहां लगवाईं थीं। महंगे कम्प्यूटर उपकरण भी लगाए गए हैं लेकिन इनका संचालन होने की नौबत नहीं आ रही है। ये महंगे उपकरण धूल फांककर खराब न हो, इसके लिए इन्हें ढक दिया गया है। अधिकारियों ने पोर्टा केबिन में भी ताला डलवा दिया है। अभी 45 करोड़ की लागत से मेन बिल्डिंग का निर्माण होना बाकी है। हवाई अड्डे पर अभी 60 से 70 फीसदी काम भी शेष हैं।
एयरपोर्ट से उड़ानें कब से शुरू होंगी, यह अभी तक साफ नहीं हुआ है। जेट एयरवेज के अधिकारियों की इसकी सूचना भेजनी है। हालांकि इस प्रोजेक्ट के शेष बचे काम लगातार कराए जा रहे हैं। - राजीव कुलश्रेष्ठ, संयुक्त महाप्रबंधक, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण