बरेली। पांच साल में कुत्तों के बधियाकरण और टीकाकरण पर नगर निगम ने डेढ़ करोड़ रुपये खर्च कर दिए, पर शहरवासियों को इनके आतंक से निजात नहीं मिल सकी। शहर में कुत्तों की संख्या कम होने के बजाय लगातार बढ़ रही है। इसकी मुख्य वजह एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) सेंटर का संचालन नहीं होना है। निगम के पास नंदोसी गांव स्थित कान्हा उपवन शेल्टर होम ही एकमात्र विकल्प है। वहां एक दिन में पांच-छह कुत्तों का ही बधियाकरण-टीकाकरण हो पाता है।
कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने और रेबीज की रोकथाम के लिए केंद्र सरकार की ओर से वर्ष 2023 में बनाए गए एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल्स बनाए गए थे। इसके तहत निकायों को कुत्तों के बधियाकरण और टीकाकरण कर उन्हें वापस उसी स्थान पर छोड़ना अनिवार्य किया गया है। आम जनता को जागरूक करने के लिए लगातार बैठकें करने का भी प्रावधान है, लेकिन नगर निगम की ओर से इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
कुत्तों के अलावा शहर में बंदरों ने भी आतंक मचा रखा है। सिविल लाइंस, राजेंद्रनगर, आवास विकास कॉलोनी, प्रेमनगर, डीडीपुरम, शास्त्रीनगर, सुभाषनगर और सीबीगंज समेत अन्य इलाकों में लोगों ने अपने घरों के अगले हिस्से को लोहे के जाल से कवर करवा लिया है, ताकि बंदर घरों में न घुस सकें। सीबीगंज में वन क्षेत्र अधिक होने के कारण वहां बंदरों का आतंक चरम पर है। बंदरों के काटने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लेकिन जिम्मेदार अनजान बने बैठे हैं। परेशान नागरिकों ने घरों के बाहर लंगूर के कट-आउट (तस्वीर) तक लगवा लिए, लेकिन बंदरों के आतंक में कोई कमी नहीं आई।
नाम मात्र का बधियाकरण
शहर में करीब 56 हजार कुत्ते हैं। इसके सापेक्ष बधियाकरण की गति काफी सुस्त है। नगर निगम से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2023-24 में 1757 मेल व 946 फीमेल डॉग का बधियाकरण किया गया। वर्ष 2024-25 में क्रमवार 1226-782, 2025-26 में 1885-1049 व वर्ष 2026-27 में 15 अगस्त तक 1192-510 कुत्तों का बधियाकरण किया गया। मेल के बजाय फीमेल डॉग का बधियाकरण ज्यादा प्रभावी हो सकता है, लेकिन निगम इस मामले में लगातार पिछड़ रहा है। वैसे भी 56 हजार कुत्तों में से हजार-दो हजार कुत्तों के बधियाकरण से उनकी तादाद पर नियंत्रण मुमकिन नहीं। बधियाकरण की यह सुस्ती कायम रही तो आने वाले दिनों में शहर में कुत्तों का आंकड़ा एक लाख के पार पहुंच सकता है।
एक-दूसरे पर डालते रहे जिम्मेदारी
पहले बंदरों को पकड़ने की जिम्मेदारी वन विभाग के पास थी, लेकिन नए शासनादेश के तहत अब यह जिम्मेदारी नगर निगम को दे दी गई है। अब निगम नए सिरे से टेंडर प्रक्रिया अपनाते हुए बंदरों को पकड़ने के लिए एजेंसी का चयन करेगा। अब तक बंदरों को पकड़ने के मामले में दोनों विभाग एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ते रहे हैं।
वर्जन
टेंडर प्रकिया अंतिम चरण में है, एक सितंबर से कुत्तों व बंदराें को पकड़ने का अभियान शुरू हो जाएगा। इसके बाद लोगों को राहत मिलेगी। - डॉ. हरपाल सिंह, पशु कल्याण अधिकारी
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न चार लोग होंगे, न एआरवी की वॉयल खुलेगी
बरेली। कुत्ते, बंदरों के काटने से जख्मी लोगों को जानलेवा रेबीज से बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर शुरू हुई एआरवी टीकाकरण की व्यवस्था को जिम्मेदार ही पलीता लगा रहे हैं। वहीं, तीन सौ बेड अस्पताल स्थित मॉडल एआरवी क्लीनिक पर दबाव बढ़ता जा रहा है। यहां रोजाना तीन सौ से ज्यादा लोगाें को वैक्सीन लग रही है। इसमें 60 फीसदी लोग स्वास्थ्य केंद्रों से भेजे गए होते हैं। इन्हें पर्चा भी नहीं दिया जाता। सीधे तीन सौ बेड अस्पताल भेज दिया जाता है।
दरअसल, मेडिकल काॅरपोरेशन से जारी एआरवी की वॉयल से पांच डोज होती हैं। यानी एक बार वॉयल खुलने पर पांच-छह घंटे के भीतर पांच लोगाें को वैक्सीन लगनी चाहिए। अन्यथा वैक्सीन खराब हो जाती है। ऐसे में एक व्यक्ति होने पर स्वास्थ्य केंद्र पर वॉयल नहीं खोले जा रहे।
मढ़ीनाथ, हरुनगला, जगतपुर, सीबीगंज से भी आए लोग
शुक्रवार को तीन सौ बेड अस्पताल में एआरवी लगवाने के लिए मढ़ीनाथ से 16 वर्षीय नीलेश, 42 वर्षीय ममता, 21 वर्षीय आयुष, जगतपुर से 29 वर्षीय सबीना, 25 वर्षीय नाजिम, संजयनगर से 16 वर्षीय तनिष्क, 40 वर्षीय नीतू, 15 वर्षीय तेजस पहुंचे। सीबीगंज से 34 वर्षीय फरमान, 21 वर्षीय उर्मिला, हरूनगला से 10 वर्षीय प्रज्ञा, भोजीपुरा से 13 वर्षीय राहुल, जौहरपुर से तीन वर्षीय अंकित समेत अन्य क्षेत्रों से लोग पहुंचे।
एक ओर जल्दबाजी, दूसरी तरफ इंतजार का तर्क
क्लीनिक प्रभारी डॉ. फैजल के मुताबिक, एक वॉयल में पांच लोगों को वैक्सीन लगती है। संभावना जताई कि वैक्सीन बर्बाद होने से बचाने के लिए केंद्रों पर दो-तीन और लोगों के आने तक इंतजार करने के लिए कहा जाता है। दूसरी तरफ, घायल व्यक्ति को एआरवी लगवाने की जल्दबाजी होती है। लंबे समय तक इंतजार के बजाय वह मॉडल क्लीनिक पर चले आते हैं।
एक भी घायल पहुंचे तो वैक्सीन लगाने का नियम
मंडलीय सर्विलांस अधिकारी डॉ. अखिलेश्वर सिंह ने कहा कि सभी यूपीएचसी, सीएचसी समेत अब आरोग्य मंदिरों पर भी एआरवी उपलब्ध है। शासनादेश भी है कि अगर एक ही व्यक्ति आए तो उसे एआरवी लगानी होगी। वैक्सीन बर्बादी रोकने के लिए केंद्रों का वर्चुअल ग्रुप बनाया है, ताकि आसपास के केंद्र पर अगर कोई व्यक्ति पहले से है तो उसे वहां भेज दें।
वर्जन
बीते दिनाें एआरवी की किल्लत थी, पर अब पर्याप्त उपलब्धता है। अनावश्यक रूप से घायल व्यक्ति को अन्य केंद्र भेज रहे हैं तो स्पष्टीकरण लिया जाएगा। वैक्सीन बर्बाद न हो और एआरवी भी लग जाए, ऐसी व्यवस्था कराएंगे। - डॉ. प्रशांत रंजन, जिला सर्विलांस अधिकारी