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एक-एक अंक पर मुकाबला, टॉपर्स ने लगाया तगड़ा जोर

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बरेली। इस बार के परीक्षा परिणामों में एक-एक अंक पर टॉपर्स के बीच जमकर मुकाबला हुआ। सीबीएसई का रिजल्ट हो या आईसीएसई या आईएससी का, तमाम छात्र-छात्राओं ने एक समान नंबर हासिल किए हैं। यही वजह है कि एक-एक रैंक पर कई बच्चों ने जगह बनाई है। ऐसे में वे टॉपर तो बने हैं लेकिन उनके ही समान कई अन्य छात्र-छात्राओं के नंबर होने से उसका क्रेज कम हो गया। वहीं, छात्र-छात्राओं पर हुई नंबरों की इस बौछार को लेकर शिक्षक भी हैरत में हैं क्योंकि पूर्व की परीक्षाओं में कभी इतने नंबर नहीं मिले।
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देशभर के विभिन्न शिक्षा बोर्ड में बढ़े रिजल्ट को लेकर पैदा हुई प्रतिस्पर्धा ने कापी जांचने की सख्ती में कुछ राहत दी है। पहले गंदी राइटिंग होने का मतलब नंबर कटना तय होता था लेकिन यूपी बोर्ड को छोड़ दें तो अब यह गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। अब यहां सिर्फ सवाल का जवाब सही होने के ज्यादा मायने हैं। इसके चलते ही छात्र-छात्राओं को जमकर नंबर मिल रहे हैं और एक-एक नंबर पर कई बच्चे जगह पा रहे हैं। सीबीएसई दसवीं के रिजल्ट में 13 बच्चों ने 499 तो 20 से अधिक ने 498 अंक पाए। इसी तरह शहर में नंबरों की बात करें तो डीपीएस, जीआरएम में तीन बच्चों ने 98 प्रतिशत अंक हासिल किए। सेंट फ्रांसिस स्कूल से दो, सोबती, डीपीएस और बीबीएल से छह बच्चों ने 97 प्रतिशत अंक पाए। इसी तरह एसआर इंटरनेशनल और बीबीएल स्कूल से ही छह बच्चों ने 96.2 प्रतिशत अंक हासिल किए। ऐसे ही आईएससी के रिजल्ट में भी हुआ है। एक ही स्कूल 90 से लेकर 95 प्रतिशत के बीच दो-चार तक दावेदार हैं।

आईएससी रिजल्ट ने तोड़ पिछले सारे रिकॉर्ड
बरेली। आईएससी रिजल्ट के इस बार के मंडल टॉपर सक्षम मेहरा को 99.25 प्रतिशत अंक मिले हैं, जो बरेली में अब तक के इतिहास में सर्वाधिक हैं। इससे पहले 2018 में हार्टमन सीनियर सेकेंड्री स्कूल की ही अपूर्वा माहेश्वरी ने 98 प्रतिशत अंक पाकर मंडल टॉप किया था। उससे पहले 2017 में बदायूं के वैभव राठौर ने 97.75 प्रतिशत अंक पाकर मंडल टॉप किया था।
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तो क्या सब जानते हैं बच्चे..
बच्चों में नंबरों को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ी है लेकिन कुछ शिक्षक इसे बहुत अच्छी नजरों से नहीं देखते। एक नामचीन कॉलेज के शिक्षक ने सवाल उठाया कि शत प्रतिशत का मतलब सबकुछ सीख लेना होता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जो बच्चे पूरे-पूरे नंबर पा रहे हैं तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि अब उन्हें कुछ सीखने की जरूरत नहीं। फिर बोले- अगर ऐसा है तो बच्चों के लिए यह खतरनाक है और उनमें सीखने की ललक कम हो जाएगी।
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