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‘बेटी ने कहा था मां बुढ़ापे की लाठी बनूंगी, पहुंचा दिया वृद्धाश्रम’

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mother' day - फोटो : अमर उजाला
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मदर्स डे आज

कहते तो यह है कि बेटियों को अपने मां-बाप से बेटों के मुकाबले ज्यादा लगाव होता है लेकिन यह जानकर हमें भी झटका लगा कि हार्टमन पुल के पास काशीधाम वृद्धाश्रम में तीन मांएं ऐसी भी हैं जिनके दिल में अपनी उन बेटियों के स्वार्थ की टीस है जिनकी वजह से उन्होंने कभी बेटे की चाह नहीं की। पति के न रहने के बाद बेसहारा हुई इन मांओं का बेटियों ने साथ नहीं दिया, यह अलग बात है लेकिन जिस तरह उन्होंने उनका घरबार छीनकर वृद्धाश्रम में पहुंचा दिया, यह दुख उन्हें दिन रात चैन से नहीं रहने देता। मदर्स डे की पूर्व संध्या पर अमर उजाला की टीम ने इन मांओं की व्यथा को साझा किया। अपनी कहानी सुनाते-सुनाते कई बार उनकी आंखें भर आईं।
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वृ्द्धाश्रम में भेज दिया.. कुछ बताया भी नहीं
वृद्धाश्रम में करीब आठ महीनों से एक-एक दिन गिन-गिनकर गुजार रहीं 65 वर्षीय रामबाला ने बताया कि उनके तीन बेटियां हैं। कुछ साल पहले तक मढ़ीनाथ पर उनका खुशहाल परिवार था। पति एक फैक्ट्री में कर्मचारी थे जो करीब तीन पहले अचानक चल बसे। दो बेटियों की शादी पति ही कर गए थे। उनके न रहने के बाद सबसे छोटी तीसरी बेटी की शादी के लिए उन्होंने अपना घर बेच दिया। शादी करने के बाद जो रकम बची, वह भी उन्होंने अपने पास नहीं रखी। बेटियों और दामाद बुढ़ापे में साथ देने का वादा किया तो तीनों को बराबर-बराबर पैसा बांट दिया। रामबाला ने बताया कि उनका एक दामाद रेलवे में है और दूसरा पुलिस में। तीसरा प्राइवेट जॉब करता है। शादी के बाद कुछ दिन छोटी बेटी ने अपने पास रखा लेकिन आठ महीने पहले चुपचाप एक पड़ोसी के साथ वृद्धाश्रम पहुंचा दिया। कुछ दिन इंतजार रहा कि बेटियां फोन करके हालचाल पूछेंगी, लेकिन आठ महीनों में तीनों में से किसी ने फोन भी नहीं किया।

मैं भी बेटियों को भूल जाना चाहती हूं
बुलंदशहर की रहने वाली साठ साल की रजनी गुप्ता वृद्धाश्रम में साल भर से रह रही हैं। उन्होंने बताया कि उनके पति कचहरी में काम करते थे। जब तक वह जिंदा रहे, उन्हें किसी बात की तकलीफ नहीं हुई। चार बेटियां थीं, जब तक वे साथ रहीं कभी अकेलेपन का एहसास तक नहीं हुआ। जैसे-जैसे उनकी शादी होती गई घर में सूनापन बढ़ता गया। चारों बेटियों की शादी करने के बाद दो साल पहले पति का निधन हो गया। इसके बाद बड़ी बेटी ने उन्हें अपने घर बुला लिया, लेकिन उनके रहने से घर में विवाद होने लगा। दामाद ने उन पर अपना घर बेचकर पैसे देने का दबाव डाला तो उन्होंने घर बेचकर सारी रकम उसे दे दी। मगर कुछ ही समय बाद उन्हें अचानक तीन रिश्तेदारों के साथ बरेली भेज दिया। उन्हें पता नहीं था कि वह वृद्धाश्रम में भेजी जा रही हैं। यहां पहुंचकर माजरा पता लगा तो उन्हें गहरा आघात लगा, फिर भी सोचा कि चलो बेटियां खुश रहेंगी और मुझे याद करेंगी लेकिन ये उम्मीद भी गुजरते वक्त के साथ जाती रही। साल भर होने को हैं, अब तक एक भी बेटी ने फोन नहीं किया। बोलीं, बेटियां याद नहीं करतीं तो मैं भी उन्हें भूल जाना चाहती हूं।
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उम्मीद है कि एक दिन बेटियां बुलाएंगी
80 वर्षीय दिव्यांग कुसुमलता कभी साहूकारा में रहती थीं। उनके दो बेटियां हैं। पति प्राइवेट जॉब करते थे। तीन साल पहले उनका निधन हुआ तो अकेली ही घर में रहने लगी। बेटियों की शादी हो चुकी थी। साल भर पहले उन्हें अचानक बताया गया कि उन्हें एक रिश्तेदार के घर भेजा जा रहा है लेकिन पहुंचा दिया वृद्धाश्रम में। पहले उन्हें शक था कि उनकी प्रॉपर्टी हड़पने के लिए दामाद ने उन्हें वृद्धाश्रम में भेजा होगा लेकिन बाद में कुछ पड़ोस के लोगों ने उन्हें बताया कि उनकी बेटियां ही उनकी प्रॉपर्टी कब्जाने के लिए काफी समय से उन्हें घर से निकालने की जुगत कर रही थीं। काफी दिनों तक जब एक भी बेटी ने फोन कर हालचाल तक नहीं पूछा तो उन्हें भी इसका यकीन हो गया। कई बार कुछ लोग प्रॉपर्टी के कागज लेकर आए लेकिन उन्होंने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए। कुसुम लता ने बताया कि पति के निधन के बाद वह घर की मरम्मत भी नहीं करा पाईं। इसलिए वह जर्जर हो गया है। बेटियां जमीन बेचकर पैसा लेना चाहती हैं, हालांकि इसके बावजूद उन्हें उम्मीद है कि एक दिन बेटियां उन्हें जरूर बुलाएंगी या मिलने आएंगी।
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