सफेदाबाद (बाराबंकी)। लखनऊ में डग्गामार निजी बसों के संचालन रुकने के बाद अब उन्होंने एक नया ठिकाना तलाश लिया है। तू डाल-डाल में पात-पात की कहावत को चरितार्थ करते हुए निजी बस संचालक अब हाईवे के किनारे होटलों और खाली पड़े प्लाटों को ठिकाना बना लिया है। सवारी उन तक लाने के लिए कुछ ऑटो सेट हो गए हैं। जो पॉलीटेक्निक और कमता से सवारी लेकर उन तक पहुंचा रहे हैं। रोडवेज बसें न मिलने के कारण यात्री भी सस्ते किराए के चक्कर में यात्रा करने को मजबूर हैं।
विगत दिनों शासन के आदेश पर पूरे प्रदेश में निजी बस, टेम्पो, टैक्सी स्टैंड को बंद करा दिया गया है। पॉलीटेक्निक चौराहे पर बवाल के बाद मामला और तूल पकड़ा। वहां से ही पूर्वांचल के कई जिलों समेत बिहार सीमा तक बसें अनाधिकृत रूप से चल रहीं थीं। दो दिनों से इस रूट पर चलने वाली निजी बसों के संचालक ने नया तरीका निकाला।
सवारियों को लखनऊ के पॉलीटेक्निक और कमता से ऑटो द्वारा लाया जाता है और बसों को सफेेदाबाद के आसपास कालिका ढाबा, सिंचाई विभाग के डाक बंगले और शालीमार पैराडाइज के सामने सवारियों से भरा जा रहा है। इसकी भनक अभी पुलिस और परिवहन विभाग को नहीं लग सकी है।
यात्री सुभाष चंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि लखनऊ से डुमरियागंज जाना था। पहले ऑटो पकड़कर शालीमार पैराडाइज के सामने मैदान तक आए। उन्होंने कहा कि सरकारी बस जगह-जगह ढाबों पर घंटों रुकती हैं। यात्री किशुन प्रसाद ने बताया कि वह बस्ती के कप्तानगंज जा रहे थे। निजी बसें लखनऊ से बस्ती पहुंचाने में मात्र दो घंटे का समय लेती हैं। जबकि रोडवेज बस चार घंटे तक लगा देती हैं।
परमिट टूरिस्ट का, ढो रहे सवारी
निजी बसों के पास सवारी ढोने का परमिट नहीं होता है। बसों को सिर्फ टूरिस्ट का परमिट होता है इसलिए सख्ती के बाद बस सवारी बैठाने के लिए अन्य जगहों का चयन कर रहे हैं। दर्जर्नों बसें लखनऊ से अयोध्या, गोंडा, बहराइच, गोरखपुर, मऊ, बिहार बॉर्डर आदि जगहों के लिए चलती हैं। एआरटीओ पंकज कुमार सिंह ने बताया कि इसे लेकर लगातार अभियान चलाया जा रहा है।